UP के सरकारी स्कूलों की किताब में सावरकर एक "स्वतंत्रता सेनानी"

by M. Nuruddin 9 months ago Views 1703

In Gandhi's country, Savarkar a "freedom fighter"
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने आवास पर एक पुस्तक का विमोचन किया है। ‘सावरकर एक भूले बिसरे अतीत की गूंज 1883-1924’ नाम से प्रकाशित की गई इस पुस्तक के विमोचन के दौरान योगी आदित्यनाथ ने कहा- “विनायक दामोदर सावरकर के स्वतंत्रता संघर्ष में योगदान को कभी नहीं मिटाया जा सकता।”

हालांकि सत्तारुढ़ बीजेपी के मुख्यमंत्री या उनके विधायक और नेता सिर्फ मंच से ही ऐसे दावे नहीं करते बल्कि इसको साबित करने के लिए राज्य के सरकारी स्कूलों में बज़ाब्ता एक पाठ के रूप में पढ़ाया भी जाता है।


सावरकर (कथित वीर) पर योगी के दावे

पुस्तक विमोचन के दौरान योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि इतिहासकारों ने सावरकर (कथित वीर) के साथ न्याय नहीं किया। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से उनके योगदान को मिटाने की कोशिश की। लेकिन कोई भी उनके योगदान को मिटा नहीं सकता। विनायक सावरकर और कथित उनकी विचारधार को हिंदू राष्ट्रवादी संगठन और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी शुरु से भुनाती रही है और राजनीतिक लाभ उठाती रही है।

विनायक सावरकर को उनके समर्थक हिंदू राष्ट्रवाद के जनक बताते हैं और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी उन्हीं की विचारधारा को आगे बढ़ाने का दावा करती है। सत्तारूढ़ बीजेपी पर यह आरोप लगते रहे हैं कि पार्टी विनायक सावरकर को एक महान नेता और वीर के रूप में स्थापित करने की कोशिश में है।

सावरकर का माफीनामा और सरकारी स्कूल की किताबों में दावे

हालांकि विनायक सावरकर के आलोचक उनके जेल से लिखे माफीनामे को आधार बनाकर आलोचना करते हैं। जेल से लिखे अपने कई माफीनामे में विनायक सावरकर ने अंग्रेज़ों से माफ करने और जेल से रिहा किए जाने की मांग की थी। इसके लिए उन्होंने अंग्रेज़ों से हमेशा वफादार रहने का वादा किया था। कांग्रेस पार्टी हमेशा यह आरोप लगाती रही है कि सावरकर “दो राष्ट्र के सिद्धांत” से भी सहमत थे।

ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में विनायक सावरकर को एक वीर और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्थापित करने की दिशा में क़दम उठाए गए हैं। राज्य के सरकारी स्कूलों की सातवीं कक्षा की किताब में विनायक सावरकर के बारे में लिखा गया है, ‘विनायक सावरकर भारत की स्वतंत्रता के लिए जन्मे, जीवित रहे और जीवन के अंतिम क्षणों तक देश की अखण्डता और स्वाधीनता के लिए संघर्ष करते रहे।”

हालांकि किताब में इस बात का ज़िक्र नहीं है कि उन्होंने अंग्रेज़ों से माफी मांगे। किताब में इस बात का भी ज़िक्र नहीं है कि अपने माफीनामे में सावरकर ने अंग्रेज़ों के प्रति वफादार रहने का वादा किया था।

सावरकर को स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश

नवंबर 2019 में इसी किताब के अंग्रेज़ी संस्करण का उप राष्ट्रपति वेनकैया नायडू ने विमोचन किया था। इस दौरान उपराष्ट्रपति श्री नायडू ने भी विनायक सावरकर को वीर की उपाधी दी थी। तब उप राष्ट्रपति नायडू ने भी विनायक सावरकर को स्वतंत्रता सेनानी बताया था।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और प्रेस काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने भी सावरकर पर अपने विचार प्रकट किए थे।

बतौर जस्टिस काटजू, ‘सावरकर 1910 ईस्वी तक ही राष्ट्रवादी थे। यह वह दौर था जब वो गिरफ्तार किए गए थे और काला पानी की सजा पाई थी।’ उन्होंने कहा कि जेल में 10 साल गुजारने के बाद अंग्रेजों की तरफ से सावरकर को प्रस्ताव मिला था कि वो सरकार के सहयोगी बन जाएं जिसे सावरकर ने स्वीकार कर लिया था।

उन्होंने लिखा है कि सेलुलर जेल से छूटने के बाद क्रांतिकारी सावरकर हिन्दू साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने के काम में जुट गए थे।

ताज़ा वीडियो