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अगर चैनल ही जज बनकर फ़ैसला करेंगे तो हम क्यों हैं- बॉम्बे हाईकोर्ट

by GoNews Desk 1 month ago Views 750

If the channel will decide as a judge then why are
न्यूज़ चैनलों पर बढ़ते मीडिया ट्रायल की प्रवृत्ति पर गहरी बॉम्बे हाईकोर्ट ने गहरी चिंता जतायी है। सुशांत सिंह राजपूत की मौत की कवरेज से जुड़ी एक याचिका पर सुनवायी करते हुए हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने  कहा कि अगर फ़ैसला टीवी चैनल ही करने लगे तो फिर अदालतों की ज़रूरत क्या है।

यह मामला रिपब्लिक टीवी से जुड़ा है जिसने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को बिना किसी जाँच निष्कर्ष के बार-बार  हत्या कहा था और अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती को दोषी बताते हुए गिरफ़्तारी की माँग की थी। चैनल ने कई अन्य लोगों के खिलाफ़ भी खुलकर अभियान चलाया था।

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बुधवार को इस संबंध में दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जी.एस.कुलकर्णी की खंडपीठ ने चैनल की तरफ़ से पेश वकील मालविका त्रिवेदी से कहा- यदि आप जाँचकर्ता, अभियोजक और न्यायाधीश बन गये हैं तो हमारा क्या उपयोग है? हम यहाँ क्यों हैं?

मालविका त्रिवेदी की दलील थी कि चैनल खोजी पत्रकारिता कर रहा था और जाँच में बरती जा रही गड़बड़ियो की ओर इशारा कर रहा था। उन्होंने कहा कि अदालत यह नहीं कह सकती कि मीडिया को जाँच में दोष को इंगित नहीं करना चाहिए या सच्चाई को रिपोर्ट नहीं करना चाहिए। लेकिन अदालत ने उनके तर्क को ख़ारिज करते हुए कहा- "अगर आपको सच जानने में इतनी दिलचस्पी है तो "आपको सीआरपीसी पर ध्यान देना चाहिए। क़ानून की अनदेखी कोई बहाना नहीं है।"

खंडपीठ ने कहा कि वो मीडिया का गला दबाने का सुझाव नहीं दे रही है। वह केवल यह देख रही है कि इस मामले में प्रोग्राम कोड का उल्लंघन किया गया है या नहीं? आपकी रिपोर्टिंग निर्धारित मानदंडों में किसी का उल्लंघन करती है या नहीं?

सीमाओं के भीतर मीडिया को सबकुछ करने की अनुमति लेकिन लेकिन इस सीमा को लाँघा नहीं जा सकता। ट्विटर पर चैनल की ओर से चले #ArrestRhea अभियान के संदर्भ में खंडपीठ ने चैनल से पूछा- "क्या जनता से पूछना कि किसी को गिरफ़्तार किया जाना चाहिए, खोजी पत्रकारिता का हिस्सा है? जब एक मामले की जाँच चल रही है कि यह मानव हत्या है या आत्महत्या तो एक चैनल का इसे हत्या बताना कैसे खोजी पत्रकारिता है?"

पीठ ने चैनल के वकील को याद दिलाया कि सीआरपीसी के तहत पुलिस को जाँच की शक्तियाँ दी गयी हैं। "आत्महत्या की रिपोर्टिंग के कुछ दिशानिर्देश हैं। कोई सनसनीखे़ज़ सुर्खियाँ नहीं बनायी जानी चाहिए। क्या आपके मन में मृतकों के लिए कोई सम्मान नहीं है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है"- अदालत ने कहा।

उधर, टाइम्स नाऊ की ओर से पेश वकील कुणाल टंडन ने आग्रय किया कि अदालत मीडिया के लिए तय स्व-नियमन के मॉडल में हस्तक्षेप न करे। कोर्ट ने आज तक, इंडिया टीवी, ज़ी न्यूज़ और एबीपी न्यूज़ के वकीलों को भी सुना। अदालत ने कहा कि "व्यथित व्यक्ति को निवारण तंत्र के पास जाने का विकल्प तभी मिलता है जब नुकसान हो चुका होता है। क्षति होने के बाद न्याय कैसे मिलेगा?" इस मामले की अगली सुनवाई 23 अक्टूबर को होगी।