केमिकल फर्टिलाइज़र के अंधाधुंध इस्तेमाल से ख़तरे में इंसान और ज़मीन

by M. Nuruddin 1 year ago Views 4817

Humans and land at risk from indiscriminate use of
भारत में ज़्यादातर किसान खेती के लिए  केमिकल फ़र्टिलाइज़र (रासायनिक खाद) पर ही निर्भर हैं। हरित क्रांति के बाद रासायनिक खाद के इस्तेमाल में तेज़ी आयी है। खेती के लिए किसान भारी मात्रा में यूरिया, डीएपी या डाय अमोनियम फॉस्फेट, मूरेट ऑफ पोटाश और सिंगल सुपर फॉस्फेट जैसे केमिकल का इस्तेमाल फर्टिलाइजर के रूप में कर रहे हैं। इसके इस्तेमाल से ज़मीन की उत्पादक क्षमता तो ख़त्म होती ही है, साथ ही लोगों की सेहत पर भी इसका बहुत बुरा असर पड़ता है।

लोकसभा में फर्टिलाइजर के इस्तेमाल को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने लिखित जवाब दिया है। उन्होंने बताया है कि लॉकडाउन की वजह से 2020-21 के दौरान फर्टिलाइजर की खपत घटी है। लेकिन इससे पहले तीन साल के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि खेती में फर्टिलाइजर का इस्तेमाल निरंतर बढ़ रहा है।


साल 2017-18 में भारतीय किसानों ने 54.38 मिलियन टन फर्टिलाइजर का इस्तेमाल किया। इसी तरह 2018-19 में 56.21 मिलियन टन और 2019-20 में 59.88 मिलियन टन फर्टिलाइजर की खपत हुई। फर्टिलाइजर के इस्तेमाल से लहलहाने वाली खेती तो होती है लेकिन इसका बहुत बुरा प्रभाव उपजाऊ मिट्टी पर पड़ता है, जिसकी उत्पादक क्षमता धीरे-धीरे ख़त्म हो जाती है।

साल 2014-15 में जारी संसदीय कमेटी की एक रिपोर्ट में हरित क्रांति के शुरुआती आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि कृषि की दशकीय वृद्धि दर लगातार घट रही है। आँकडों के मुताबिक़ 1960-70 के दशक में कृषि उत्पादन की वृद्धि दर 8.37 फीसदी थी जो 2000-2010 के दशक में गिरकर 2.61 फीसदी रह गयी। रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई थी कि कृषि की अगर विकास दर यही बनी रही तो 2025 तक अपने नागरिकों के लिए भोजन की आपूर्ति कर पाना  मुश्किल हो सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक़ कुल फर्टिलाइजर में 85 फीसदी फर्टिलाइजर का इस्तेमाल देश के सिर्फ 292 ज़िलों में होता है। इनमें पंजाब और हरियाणा के ज़िले टॉप पर हैं। कैमिकल रेशियो के हिसाब से अगर देखें तो नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम या एनपीके का निम्नतम अनुपात 4:2:1 है। जबकि हाल के वर्षों में देश में 6.7:2.4:1 की दर से केमिटल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल हो रहा है। पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख कृषि राज्यों में हालात गंभीर हैं जहां एनपीके रेशियो 31.4:8.0:1 और 27.7:6.1:1 है।

नाइट्रोजन जैसे कैमिकल का फर्टिलाइजर के रूप में अंधाधुंध इस्तेमाल मिट्टी और फसल के लिए नुकसानदेह है। साल 2014-15 में केन्द्र सरकार ने ‘सॉयल हेल्थ कार्ड स्कीम’ की शुरुआत की थी। इस योजना के तहत खेत की मिट्टी का परीक्षण कर किसानों को सही मात्रा में फर्टिलाइजर के इस्तेमाल की जानकारी दी जाती है।

नाइट्रोजन से ग्राउंडवॉटर भी प्रदूषित होता है। मिट्टी की बैक्टीरिया की वजह से नाइट्रोजन जैसे कैमिकल, नाइट्रेट में तब्दील हो जाते हैं जो ग्राउंडवॉटर के साथ मिश्रित हो जाता है। इस खाना-पानी के इस्तेमाल से हमारे शरीर में तरह-तरह की बीमारियां पैदा होती है। हाल के वर्षों में नॉन-यूरिया फर्टिलाइजर का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा है। आँकड़े बताते हैं कि पिछले साल जहां यूरिया फर्टिलाइजर की वृद्धि दर करीब 1.5 फीसदी रही वहीं नॉन-यूरिया फर्टिलाइजर की वृद्धि दर 3.5 फीसदी से ज़्यादा है।

खेती में बढ़ रहे लगातार फर्टिलाइजर के इस्तेमाल की वजह से इसको बनाने वाली कंपनियाँ बड़े-बड़े प्लांट बना रही हैं। हाल ही में सरकार ने 27 इंसेक्टिसाइड्स और पेस्टिसाइड्स पर प्रतिबंध लगाने की योजना बनाई थी जिसका किसान और फर्टिलाइजर कंपनियों ने भी विरोध किया था। हाल ही में केन्द्र सरकार की भी एक अमोनिया-यूरिया फर्टिलाइजर के लिए ब्रह्मपुत्र वैली में फर्टिलाइजर्स कॉर्पोरेशन बनाने की योजना है।

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