देश में बढ़े मानवाधिकार उल्लंघन के मामले, अव्वल है यूपी का योगीराज

by Rahul Gautam 8 months ago Views 2616

लोकसभा में गृह मंत्रालय ने जानकारी दी है कि साल 2017 में जहाँं यूएपीए के तहत कुल 901 मामले दर्ज़ हुए थे, वहीं साल 2018 में ये आंकड़ा पहुंच गया 1182 तक।

Human rights violation cases increased in the coun
देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न बढ़ता जा रहा है। ऐसा मानना है खुद गृह मंत्रालय का। देश में मानव अधिकारों की वकालत करने वालों के उत्पीड़न में सबसे आगे है  योगी आदित्यनाथ का उत्तर प्रदेश। लोकसभा में बीते सितंबर  पूछे गए एक सवाल के जवाब में गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने बताया कि  2017-18 में 73 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न के मामले सामने आये थे, जो अगले साल बढ़कर 89 हो गए और साल 2019-20 में यह आंकड़ा पहुंच गया 105 तक।

मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में सबसे ख़राब स्थिति उत्तरप्रदेश में योगीराज की रही। किशन रेड्डी के जवाब के मुताबिक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को 2017-18 में उत्तर प्रदेश से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न की सिर्फ 3 शिकायते मिली थीं, जो 2019-20 में बढ़कर 26 हो गईं।  यानि एक साल में  900 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी। इसके अलावा राजस्थान में भी आँकड़े  उल्टी दिशा में घूमे।


2017-18 से लेकर 2019-20 तक मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतें 2 से बढ़कर 7 हो गयीं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं आमतौर पर कमजोर तबकों जैसे दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिलाओं और मज़दूरों की आवाज़ उठाते हैं। वे कानून के जानकार होते हैं, ऐसे में अगर उनका उत्पीड़न हो रहा है, तो समझा जा सकता है कि जिनके उत्पीड़न का वे सवाल उठाते हैं, उनका क्या हाल होता होगा।

कई जगह देखने को मिला की मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ अक्सर  UAPA यानि अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट के तहत कार्रवाई होती है। ये वही कानून है जिसके बेजा इस्तेमाल को लेकर कई मानवाधिकार संगठन मोद सरकार की आलोचना करते रहते हैं। अजब तो ये है कि UAPA के तहत होने वाली गिरफ्तारियों में लगातार इज़ाफा हो रहा है लेकिन पुलिस चार्जशीट दाखिल करने में बेहद सुस्त है। मतलब साफ़ है कि पुलिस बिना वाजिब कारण के इस क़ानून का इस्तेमाल कर रही है।

लोकसभा में गृह मंत्रालय ने जानकारी दी है कि साल 2017 में जहाँं यूएपीए के तहत कुल 901 मामले दर्ज़ हुए थे, वहीं साल 2018 में ये आंकड़ा पहुंच गया 1182 तक । 2019 के आंकड़ों के मुताबिक उस वर्ष 1226 मामले UAPA के तहत दर्ज हुए यानी ऐसे मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई।

लोकसभा में पेश आंकड़े के मुताबिक 2018 तक 25 प्रतिशत से भी कम मामलो में पुलिस ने अब तक चार्जशीट दाखिल की है। यूएपीए के मामलो से जुड़ा ये सवाल सीपीआई के राज्यसभा में बिनॉय विश्वम ने पूछा था। गौरतलब है कि दिल्ली दंगों में कथित भूमिका के लिए पिंजरातोड़ की कार्यकर्ता देवांगना कलिता और नताशा नरवाल को यूएपीए के तहत ही गिरफ्तार किया गया था। दोनों इस साल मई से जेल में है ।

हाल ही में, दिल्ली पुलिस ने जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद को दिल्ली दंगों में कथित भूमिका के लिए यूएपीए के तहत ही गिरफ्तार किया। इसके अलावा भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में यूएपीए के तहत मानवाधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन, एडवोकेट सुरेंद्र गडलिंग, प्रोफेसर शोमा सेन, महेश राउत, सुधा भारद्वाज आदि भी जेल में हैं।

यदि आरोपी यूएपीए के प्रावधानों के तहत आरोपित हैं, तो वह अग्रिम जमानत नहीं मांग सकता है, और जांच की अवधि को सरकारी वकील के अनुरोध पर 90 दिनों से 180 दिन तक बढ़ाया जा सकता है - जिसका अर्थ है कि अभियुक्त के पास मूलत: जमानत प्राप्त करने का कोई मौका नहीं होता है। यदि न्यायालय को मामला प्रथम दृष्टया सही लगता है, तो वह आरोपी व्यक्ति को नियमित जमानत देने से भी इनकार कर सकता है।

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