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कृषि निजिकरण से किसानों को फायदा ? चीनी मिलों पर किसानों के हज़ारों करोड़ बकाया

by GoNews Desk 2 months ago Views 2485

How much do farmers benefit from agricultural fund
आज देशभर के किसान कृषि क़ानून के विरोध में दिल्ली पहुंच रहे हैं। करीब 500 किसान संगठन और दस बड़ी ट्रेड यूनियनों ने मोदी सरकार के कृषि क़ानून के ख़िलाफ 'दिल्ली चलो' का ऐलान किया था। मोदी सरकार का कहना है कि इस क़ानून के बन जाने से किसानों की आय दोगुनी होगी और किसानों को उनकी उपज का ठीक दाम मिल सकेगा। लेकिन किसानों और किसान संगठनों का कहना है कि सरकार इस क़ानून के जरिए खेती-किसानी को निजी हाथों में सौंपना चाहती है और एपीएमसी सिस्टम को ख़त्म करना चाहती है। आख़िर खेती-किसानी में निजी हस्तक्षेप से किसानों को फायदा होगा या नुकसान, जानिए इस रिपोर्ट में।

बता दें कि केन्द्र सरकार खुद ही संसद में बता चुकी है कि किसानों का पैसा निजी कंपनियों के पास पेंडिंग है जिसका भुगतान नहीं किया जा रहा है। मॉनसून सत्र के दौरान सरकार ने बताया है कि 2016 से गन्ना किसानों सरकारी और निजी कंपनियों पर किसानों का 15 हज़ार 683 करोड़ रूपये बकाये भुगतान नहीं किया गया है। इनमें अकेले बजाज हिन्दुस्तान की 14 मिलों पर किसानों का करीब तीन हज़ार करोड़ रूपये बकाया है जिसका कंपनी ने भुगतान नहीं किया है।


सबसे ज़्यादा किसानों का बकाया भाजपा शासित राज्य उत्तर प्रदेश में है। राज्य सरकार ने खुद भी विधानसभा में इसकी जानकारी दी है। चीनी सीज़न 2019-20 की अवधि में चीनी कंपनियों ने किसानों की कुल खरीद का 76 फीसदी ही भुगतान किया है। इनमें सबसे आगे मोदी सुगर मिल्स है जिसने इस दौरान किसानों की कुल गन्ना खरीद का महज़ 37 फीसदी ही भुगतान किया है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ निजी कंपनियों पर गन्ना किसानों का 7,702 करोड़ रूपये से भी ज़्यादा पेंडिंग है। वहीं कॉर्पोरेट क्षेत्रों पर 610 करोड़ और खुद सरकार पर किसानों का 130 करोड़ रूपये बकाया है।

बता दें कि विवादित कृषि क़ानून के विरोध में किसान संगठनों से लेकर विपक्ष भी सड़क पर है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने क़ानून बनाने से लेकर संसद से पारित करवाने तक में संवैधानिक नियमों का उल्लंघन किया है। जबकि किसान संगठनों की दलील है कि इस क़ानून के बन जाने से निजी कंपनियां मनमाने ढंग से काम करेगी जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।

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