प्रधानमंत्री के केयर फंड से जारी 2000 करोड़ में कितने वेंटिलेटर, बेड खरीदे गए ?

by GoNews Desk 7 months ago Views 1449

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आरोप लग रहे हैं कि केन्द्र की मोदी सरकार की ग़लतियों की वजह से देश के अस्पतालों में वेंटिलेटर और बेड की किल्लत हो रही है। इसके साथ ही एक बार फिर प्रधानमंत्री केयर फंड सवालों के घेरे में आ गया है। कोरोना संक्रमण की पहली लहर के दौरान बनाए गए इस केयर फंड से बेड और वेंटिलेटर खरीदने के लिए प्रधानमंत्री की तरफ से फंड जारी किए गए थे। लेकिन एक साल बाद भी अस्पतालों में उन पैसों से बेड या वेंटिलेटर नहीं पहुंच सके हैं और पहुंचे भी हैं तो उनमें कई खामियां हैं या स्टाफ की कमी से इस्तेमाल नहीं हो पा रहे हैं।

बीबीसी हिंदी ने प्रधानमंत्री द्वारा जारी फंड और उनसे कितने बेड, वेंटीलेटर अस्पतलों में पहुंचे इसको लेकर पड़ताल की है, जिसमें यह खुलासा हुआ है। मसलन पिछले साल जून महीने में प्रधानमंत्री ने केयर फंड से 50 हज़ार मेड इन इंडिया वेंटिलेटर की ख़रीद के लिए 2000 करोड़ रूपये जारी किए थे। 

रिपोर्ट में बताया गया है कि कई कंपनियों को टेंडर दिए गए थे और कंपनियों को इसके लिए भुगतान भी किया गया था, इसके बावजूद अस्पतालों में पूरे वेंटिलेटर नहीं पहुंच सके। समस्या यह भी है कि कई जगह अस्पतालों में वेंटिलेटर तो लगाए गए हैं लेकिन डॉक्टरों को उनके इस्तेमाल की ट्रेनिंग नहीं दी गई। यह समस्या बिहार के कई अस्पतालों में देखी गई है। आसान भाषा में कहें तो कोरोना की पहली लहर का असर कुछ कम होने के बाद बड़े पैमाने पर वेंटिलेटर बनाने में ढील दी गई।

पिछले साल अगस्त 2020 में एक आरटीआई के जवाब में स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि आंध्र प्रदेश की कंपनी AMTZ को पीएम केयर फंड से 13,500 वेंटिलेटर के लिए 500 करोड़ रूपये दिए गए थे। इसी तरह गुजरात की एक निजी कंपनी सीएनसी को 5000 वेंटिलेटर के ऑर्डर दिए गए थे और कंपनी को इसके लिए 121 करोड़ रूपये का भुगतान किया गया था।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह भी बताया कि दोनों ही कंपनियों की मशीनें क्लिनिकल ट्रायल में फेल हो गई। नोएडा की भी एक कंपनी AgVa को 10,000 वेंटिलेटर बनाने का कॉन्ट्रेक्ट दिया गया था। इस कंपनी के वेंटिलेटर भी क्लिनिकल ट्रायल में फेल हो गए जबकि इसके बावजूद अस्पतालों में इन मशीनों का इस्तेमाल जारी रहा। बाद में कंपनी के सीईओ ने यह बयान दिया था कि ऑर्डर में पांच हज़ार वेंटिलेटर के सप्लाई किए गए हैं जबकि ‘पांच हज़ार वेंटिलेटर अब भी कंपनी के गोदाम में पड़े हैं।’

कमोबेश यही हाल अन्य टेंडर और ऑर्डर का भी है। कई अन्य कंपनियां हैं जिन्हें केन्द्र ने वेंटिलेटर बनाने के ऑर्डर दिए लेकिन या तो वेंटिलेटर क्लिनिकल ट्रायल में फेल रहे या ऑर्डर का सप्लाई ही पूरा नहीं हुआ। परेशानी सिर्फ वेंटिलेटर की कमी की नहीं है बल्कि मौजूद वेंटिलेटर्स को इस्तेमाल में न लाए जाने की भी है।

बताया जा रहा है कि बिहार के कई सरकारी अस्पतालों में लगाए गए वेंटिलेटर चालू नहीं हो पाए हैं। कहीं स्टाफ की कमी बताई जा रही है तो कहीं संसाधनों की कमी का हवाला दिया जा रहा है। बिहार के गया के एक अस्पताल को 30 वेंटिलेटर मिले लेकिन स्टाफ की कमी से वेंटिलेटर का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के एक अस्पताल में 500 से ज़्यादा वेंटिलेटर दिए गए लेकिन ज़्यादातर मशीनें आज भी बंद हैं जबकि संक्रमित मरीज़ इसकी वजह से दम तोड़ रहे हैं।

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