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किसानों की संपदा से प्रदूषण की समस्या कैसे बनी पराली?

by Pankaj Srivastava 6 months ago Views 1776

How did the problem of pollution from farmers' wea
दिल्ली की हवा ख़तरनाक श्रेणी में पहुँच गयी है। इस मौसम में लगभग हर साल ही ऐसा होता है। वजह पराली को बताया जाता है जो दिल्ली और आसपास के राज्यों के किसान अपने खेत में जला देते हैं। नई पीढ़ी को कई बार यह समझ में नहीं आता कि वे ऐसा क्यों करते हैं। कई तो इसका ठीक-ठीक मतलब भी नहीं जानते।

पराली यानी पुआल या पैरा। कुछ साल पहले तक यह किसानों के लिए बेशक़ीमती थी। दरअसल यह धान की बालियों का निचला हिस्सा या डंठल है। धान एक ऐसा प्रचिलिति अनाज है जिसकी ज़द में पूरा हिंदुस्तान है। कोई ऐसा राज्य नहीं जहाँ चावल न खाया जाता हो। किसान धान निकालने के बाद उसके डंठल का तरह-तरह से इस्तेमाल कर लेते थे।


झोपड़ी का छप्पर भी इसी से छाया जाता था। इसके अलावा जाड़े में ठंडी ज़मीन पर पुआल बिछाकर गर्मी का इंतज़ाम किया जाता था। पर सबसे बड़ी राहत तो पशुपालन में मिलती थी। पुआल को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर हरे चारे के साथ मिलाया जाता था। इससे पशुओं के लिए पौष्टिक चारे का इंतज़ाम हो जाता था। कई जगह इसका इस्तेमाल पैकिंग में भी किया जाता था।

यानी पराली समस्या नहीं संपदा थी जिसकी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अहम रोल था। लेकिन विकास की स्वाभाविक गति के साथ गाँव में तमाम आवासीय योजनाएँ पहुँचीं और ग़रीबों को भी एक कमरे का ही सही, पक्का मकान मिल गया। इससे छप्पर जैसी चीज़ों की ज़रूरत न रही और पराली की माँग कम हो गयी।

इसके अलावा मशीन से धान कटाई के कारण धान की सिर्फ़ बालियाँ कटने लगीं, नीचे का बड़ा डंठल बच जाता है। हाथ से कटाई होने पर धान की बाली काफी नीचे से काटी जाती थी। छोटे डंठल को अगली जुताई में मिट्टी में मिला देना आसान था, लेकिन बड़े डंठल को काटकर खेत से बाहर करने में पैसा लगता है। यानी किसान की उत्पादन लागत बढ़ जाती है।

पंजाब और हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फ़सल कटाई में मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल के साथ पराली के निस्तारण की समस्या भी बढ़ गयी है। खेती में पशुओं का इस्तेमाल कम होने के कारण भी ऐसा हुआ। पहले किसान एक-दो जोड़ी बैल अपने पास रखते थे, पर अब ज़रूरत पड़ने पर किराये पर ट्रैक्टर से जुताई करा देते हैं।

अक्टूबर-नवंबर में धान की कटाई के बाद किसानों के सामने जल्द से जल्द गेंहूँ या रबी की दूसरी फ़सलों के लिए खेत तैयार करने की चुनौती होती है। लिहाज़ा वे जल्द से जल्द इससे छुटकारा चाहते हैं।

ख़र्च  न करना पड़े, इसलिए वे खेतों में ही पराली जला देते हैं जिसका धुआँ आसपास के इलाकों में छा जाता है। पराली जलाने से बहुत से कीट-पतंगे भी ख़ाक हो जाते हैं जो फ़सलों को बहुत सी बीमारियों से बचाते हैं। इन्हें कृषि विज्ञान 'मित्र कीट' के रूप में चिन्हित करता है। यह ईकोसिस्टम बनाये रखने में मददगार होते हैं।

ग़ौर से देखें तो मशीनीकरण और विकास की अँधी दौड़ ने पराली को संपदा से समस्या में बदला है। यह फिर से संपदा में कैसे बदले, यह एक बड़ी चुनौती है। सिर्फ़ किसानों को सज़ा देना इस समस्या का समाधान नहीं है। इसके लिए पराली को खाद बना देने या अन्य किसी रूप में इस्तेमाल करने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान की ज़रूरत है।

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