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हिंदू-मुस्लिम सभी करते हैं अंतर्धार्मिक विवाह, शिगूफ़ा है ‘लव जिहाद’

by Rahul Gautam 1 week ago Views 1965

Hindu-Muslims all do inter-religious marriage, Shi
देश में अचानक ‘लव जिहाद’ पर हंगामा तेज़ हुआ है। ऐसा लगता है कि यह कोई बड़ी समस्या है। बीजेपी की कई सरकारें इसके ख़िलाफ़ क़ानून लाने की तैयारी कर रही हैं। कहा जा रहा है कि मुस्लिम लड़के नाम बदलकर या धोखा देकर हिंदू लड़कियों से शादी करते हैं और उनका धर्म बदल देते हैं। यह एक बड़ी डिज़ाइन का हिस्सा है। हालाँकि इस संबंध में किसी तरह के आँकड़े सरकारी स्तर पर उपलब्ध नहीं हैं।

हक़ीक़त यह है कि देश का क़ानून दो बालिग़ लोगों को बिना किसी बाधा के शादी की इजाज़त देता है। इसके लिए बाक़ायाद 'स्पेशल मैरिज एक्ट' बना हुआ है। साल 2004 से अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक शादियों में मदद करने वाली दिल्ली की संस्था ‘धनक’ के पास अब तक हज़ारों मामले आ चुके हैं।

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इस संस्था के आँकड़े साफ़ बताते हैं कि देश में ‘लव जिहाद’ जैसा कुछ भी नहीं है। मसलन दिसंबर 2012 से सितंबर 2020 के बीच जिन 1778  लड़कियों ने दूसरे धर्म में शादी करने के लिए ‘धनक’ से संपर्क साधा, उनमे 53 फीसदी हिंदू लड़कियाँ थी, 39 फीसदी मुस्लिम थीं, 4 फीसदी ईसाई और 3 फीसदी सिख परिवार से थीं। इन आँकड़ों से कुछ भी असामान्य नहीं लगता और न ही कोई पैटर्न उभर कर आता है।

ऐसा भी नहीं है कि अंतर्धार्मिक शादियाँ हाल में होना शुरू हुई हैं। हक़ीक़त यह है कि जहाँ भी युवाओं के पास जीवन-साथी चुनने का अधिकार है, वे बिना झिझक ऐसी शादियाँ करते हैं। भारतीय समाज की स्थिति को देखते हुए वैसे भी ऐसी शादियाँ कम होती हैं। Dynamics of inter-religious and inter-caste marriages in India नाम से जारी एक स्टडी, जिसमें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2005 -06 के तीसरे दौर के आंकड़ों का उपयोग किया गया था, बताती है कि देश में केवल 2.1% विवाह अंतर्धार्मिक होते हैं।

इस स्टडी के मुताबिक सबसे ज्यादा अंतर्धार्मिक शादियाँ पूर्वोत्तर के राज्यों अरुणाचल ( 9.2%) और सिक्किम ( 8.1%) में होती है और देश में सबसे कम पश्चिम बंगाल (0.3%) और जम्मू कश्मीर (0.7%) में। वजह ये है कि पूर्वोत्तर के राज्यों में महिलाओं को देश के अन्य राज्यों के मुकाबले ज्यादा आज़ादी हासिल है जिसकी वजह से ऐसा नज़र आता है।

हिंदू लड़कियाँ इतनी मूर्ख नहीं होती हैं कि सिर्फ़ नाम देखकर किसी से शादी कर लें। रही बात धोखे की तो वह समानधर्मा शादियों में भी ख़ूब होते हैं। जबरन धर्म परिवर्तन और धोखा देने के मामले में पहले से क़ानूनी प्रावधान उपलब्ध हैं। तो क्या आर्थिक और तमाम अन्य मोर्चों पर बुरी तरह घिरी सरकार 'लव जिहाद' को ध्यान भटकाने के शिगूफ़े की तरह इस्तेमाल करना चाहती है? लगता तो यही है।