Hijab Row: कर्नाटक हाई कोर्ट ने मुस्लिम छात्राओं की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा !

by GoNews Desk 5 months ago Views 1942

Hijab controversy: Karnataka High Court reserves i
11 दिनों तक मामले की सुनवाई के बाद कर्नाटक हाई कोर्ट ने शुक्रवार को मुस्लिम छात्राओं द्वारा दायर याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। मुख्य न्यायाधीश रितु राज अवस्थी और न्यायमूर्ति कृष्णा एस दीक्षित और न्यायमूर्ति जेएम खाजी की बेंच मामले की सुनवाई कर रही थी।

याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता युसूफ मुच्छला ने कोर्ट में दलील दी...


- हमने तो सिर्फ इतना कहा है कि सिर को कपड़े से ढंकने दिया जाए। हमें ऐसा करने से रोकना कॉलेज का अधिकार नहीं है।

- आवश्यक धार्मिक अभ्यास का सवाल विवेक की स्वतंत्रता से नहीं जोड़ा जा सकता।

- यहां तक ​​कि हदीस भी कहती है कि चेहरे को ढंकने की नहीं बल्कि हिजाब पहनना ज़रूरी है।

- वरिष्ठ वकील ने कहा कि क़ुर'आन में जो कहा गया है वो अनिवार्य होते हुए भी ज़रूरी नहीं हो सकता। यह शायरा बानो केस के विपरीत है।

वरिष्ठ वकील रविवर्मा कुमार ने तर्क दिया:

- कॉलेज डेवलपमेंट (सीडीसी) के अध्यक्ष स्थानीय विधायक होंगे, इस कमेटी के लिए 12 सदस्यों में से 11 को विधायक मनोनीत करेंगे। यह विधायक को दी गई पूर्ण शक्ति है, जैसे कॉलेज उनकी हथेली पर रख दिया गया हो।

- एक विधायी सदस्य को कार्यकारी शक्ति सौंपने का मुद्दा स्वीकार नहीं किया जा सकता है;

- विधायक की कोई जवाबदेही नहीं है। उनपर कोई नियंत्रण नहीं है। मान लीजिए कि धन का दुरुपयोग होता है और समिति जिम्मेदार है, सीडीसी को कौन जवाबदेह ठहराएगा?

इसके बाद याचिकाकर्ता-इन-पर्सन डॉ. विनोद कुलकर्णी ने कोर्ट में दलील दी

- यह निस्संदेह और ज़ोरदार रूप से इनकार किया जाता है कि हिजाब का ज़िक्र क़ुर'आन में नहीं है।

- इस बात से इनकार किया जाता है कि हिजाब पहनना सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के ख़िलाफ़ है। प्रतिबंध की वजह से सामाजिक ताने-बाने में गड़बड़ी देखी जा रही है।

- स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने से मुस्लिम लड़कियों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है, ख़ासकर उनपर जो हिजाब लगाती हैं;

- हिजाब को 1400 सालों से एक सांस्कृतिक प्रथा और रिवाज के रूप में देखा गया है।

एक वकील ने तब एक याचिका का उल्लेख किया जिसमें हिजाब पहने मुस्लिम छात्राओं की वीडियोग्राफी से मीडिया को प्रतिबंधित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

वकील बालकृष्ण ने कहा "मीडिया खुले तौर पर या गुप्त रूप से ऐसा कर रही है। छात्राओं को अपमानित और अपराधी बनाया जा रहा है, एक शिक्षक द्वारा अपना बुर्का हटाने का वीडियो है, लड़कियों का पीछा करते हुए भी वीडियो देखा गया है।

हालांकि, बेंच ने उन्हें संबंधित अधिकारी के पास शिकायत दर्ज करने के लिए कहा और याचिका खारिज कर दी।

वकील सुभाष झा ने तर्क दिया कि इस मुद्दे को हर हाई कोर्ट के सामने लाया गया है, और यह "न्यायिक समय की आपराधिक बर्बादी" है। उन्होंने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) से पूरे देश में बड़े पैमाने पर आंदोलन की गहन जांच करने का निर्देश देने की भी मांग की।

गुरुवार को, याचिकाकर्ताओं में से एक ने तर्क दिया कि भारत न तो एक हिंदू राष्ट्र है और ना ही एक इस्लामी गणराज्य है, बल्कि यह एक लोकतांत्रिक, गणतंत्र है जहां क़ानून का शासन होना चाहिए।

वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने अपने तर्कों में कहा कि राज्य चुनाव को प्रतिबंधित करने के लिए संवैधानिक नैतिकता का हवाला दे रहा था, इसके विपरीत सुप्रीम कोर्ट के चुनाव समर्थक फैसलों में अवधारणा का इस्तेमाल कैसे किया गया था।

पहले की सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि हिजाब पहनने की प्रथा को सबरीमाला और ट्रिपल तालक निर्णयों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित संवैधानिक नैतिकता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।

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