गांधी जी और हिन्दी

by GoNews Desk 2 days ago Views 736

Hindi Diwas

आज हिन्दी दिवस है और देशभर में सरकारी और गैर-सरकारी रूप से इस दिवस को मनाया जा रहा है। सरकार महकमों में हिन्दी पखवाड़ा आज से शुरू हो गया है और 15 दिन तक हिन्दी में कामकाज को तरजीह दी जाएगी। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित तमाम नेताओं ने इस मौके पर देश को बधाई दी। अख़बारों में हिन्दी के हाल पर विश्लेषण हो रहे हैं लेकिन हिन्दी का उद्देश्य क्या है और हिन्दी में पत्रकारिता को किस तरह से देखना आंकना चाहिए, इस पर चर्चा कम है।

हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है और यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ है। महात्मा गांधी ने अज़ादी की लड़ाई में पत्र-पत्रिकाओं को एक बड़ा हथियार बनाया था। उन्होंने यंग इंडिया और नवजीवन से हिंदुस्तानियों में आज़ादी के जज़्बे को मज़बूती देनी शुरू की। तमाम लोगों ने उनसे आग्रह किया कि वह हिन्दी में भी एक पत्रिका या अख़बार निकालें। इससे हिन्दी नवजीवन की शुरूआत हुई। जिसका पहला संस्करण 19 अगस्त, 1921 को छापा गया। इससे उन्होंने ‘स्वराज्य की व्याख्या’ की हिंदी में शुरूआत की। पहले संस्करण में उन्होंने पाठकों को यह भी बताया कि हिन्दी कैसी होनी चाहिए। 

“मुझे मालूम है कि नवजीवन को हिन्दी में प्रकाशित करना कठिन काम है तथापि मित्रों के आग्रहवश होकर और साथियों के उत्साह के उल्लाह से नवजीवन का हिन्दी अनुवाद निकालने की दृष्टता मैं करता हूं। मेरे विचारों पर मेरा प्रेम है। मेरा विश्वास है कि उनके अनुकरण से जनता को लाभ है। इस लिए उनको हिन्दी में प्रकट करने की इच्छा मुझे बहुत समय से थी परन्तु आजतक परमात्मा ने उसे सफल नहीं किया था। हिन्दुस्तानी के सिवा दूसरी भाषा राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती। इस में कुछ भी शक नहीं। जिस भाषा को करोड़ों हिन्दु-मुस्लमान बोल सकते हैं वही अखिल भारतवर्ष की सामान्य भाषा हो सकती है, और उसमें जबतक नवजीवन न निकाला गया तबतक मुझे दुःख था।”

“हिन्दुस्तानी-भाषानुरागी “हिन्दी-नवजीवन” में उत्तम प्रकार की हिन्दी की आशा न रक्खें। “नवजीवन” और “यंग इंडिया” का अनुवाद ही उसमें देना सम्भवनीय है। मुझे न तो इतना समय है कि हमेशा हिन्दुस्तानी में लिख सकूं और न बहुत हिन्दुस्तीन लिखने की शक्ति मुझमें है।”

 

““हिन्दुस्तीन-भाषा का प्रचार” इस साहस का मुख्य हेतु नहीं है। “शान्तिसमय अ-सहयोग प्रचार” ही इस का उद्देश समझना चाहिए।…इसलिए “हिन्दी नवजीवन” की आवश्यकता थी। परमात्मा से प्रार्थना है कि जो लोग केवल हिन्दुस्तानी ही समझते हैं उन्हें “हिन्दी नवजीवन” मददगार हो।”- मोहनदास कर्मचंद गांधी 

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