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खनन पर पाबंदी से गोवा की अर्थव्यवस्था पर ख़तरा, लाखों लोग तीन साल से बेरोजगार

by GoNews Desk 1 month ago Views 1290

For Over Three Years Now, Mining Nightmare Continu
गोवा, देश का दूसरा सबसे छोटा राज्य और सबसे बड़े अयस्क एक्सपोर्टर राज्य की अर्थव्यवस्था ख़तरे में है। फरवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में 88 खनन पट्टों को रद्द करने का फैसला सुनाया था। इस फैसले का राज्य की अर्थव्यवस्था पर तो प्रतिकूल प्रभाव पड़ा ही, साथ ही हज़ारों लोगों का रोजगार भी छिन गया।

खनन का राज्य की अर्थव्यवस्था में 25 फीसदी योगदान है। कोरोना के साथ-साथ राज्य का टूरिज़्म सेक्टर भी ठप्प पड़ा है। इसकी वजह से राज्य की अर्थव्यवस्था की हालत और ज़्यादा ख़स्ता हो गई। देश का दूसरा सबसे छोटा यह राज्य पहाड़ों से घिरा है।


अनुमानों के मुताबिक़ राज्य की पहाड़ियों में एक अरब टन का अयस्क का अभी भी बड़ा भंडार है जिसमें इसके पड़ोसी राज्य कर्नाटक की सीमा पर वन्यजीव रिज़र्व भी शामिल है। देशभर में स्टील के लिए आधे से ज़्यादा कच्चा माल यहीं से आता है। चुंकी खनन इस राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए रीढ़ की हड्डी के बराबर थी, इसलिए राज्य को मिलने वाले विदेशी मुद्रा का नुक़सान भी बड़ा है।

इंडियन पीएसयू की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ राज्य में सभी तरह की खनन पर प्रतिबंध लगने से राज्य की अर्थव्यवस्था को अबतक दस अरब डॉलर का नुक़सान हो चुका है। लौह अयस्क के एक्सपोर्ट से राज्य की अर्थव्यवस्था में हर महीने 60 हज़ार करोड़ रूपये जोड़े जा रहे थे।

खनन पूरी तरह से बंद होने से राज्य के खजाने को हर साल 3,500 करोड़ रूपये का नुक़सान हो रहा है। इन प्रतिबंधों का राज्य के फाइनेंस पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।

इंडियन पीएसयू ने सरकारी आंकड़ों के हवाले से बताया है कि साल 2013 से गोवा का सार्वजनिक कर्ज दोगुने से भी ज्यादा बढ़कर करीब 180 अरब रुपये पर पहुंच गया है। कहा जाता है कि यही वजह रही की राज्य सरकार को शराब और ज़मीन की खरीद-बिक्री पर टैक्स लगाना पड़ा।

लेकिन इससे नुक़सान की भरपाई बहुत कम ही हुई। इनके अलावा कोरोना की वजह से राज्य का टूरिज़्म बंद है जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था और भी ज़्यादा प्रभावित हो रही है।

खनन बंद होने से गोवा राज्य की 30 फीसदी से ज़्यादा आबादी की आजीविका पर भी ख़तरा पैदा हुआ। राज्य में 70 हज़ार से ज़्यादा आबादी प्रत्यक्ष और दो लाख आबादी अप्रत्यक्ष तौर पर खनन पर ही निर्भर थी।

इतनी बड़ी आबादी तीन साल बाद भी नुक़सान से उबर नहीं पाई है और राज्य सरकार भी इनके लिए कोई अलग इंतज़ाम नहीं कर सकी है। इसकी वजह से इससे जुड़े लोग आए दिन राज्य सरकार के ख़िलाफ विरोध-प्रदर्शन करते हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

गोवा खनन पीपुल्स फ्रंट के अध्यक्ष पुति गोनकर के हवाले से बताया गया है कि, 'गोवा, दमन और दीव खनन रियायतें (खनन पट्टे अधिनियम की समाप्ति और घोषणा) 1987 में अधिनियमित की गई थी, जिसे पूर्ववर्ती खनन रियायतों के रूप में समझा जाना था।'

बताया गया है कि इसके आधार पर खनन की लीज़ साल 1987 में 50 सालों के लिए दी गई थी जो साल 2037 में ख़त्म हो रही है।'

जानकार कहते हैं कि तीन साल से खनन के बंद होने से तीन लाख लोगों का जीवन मृत्यु की कगार पर पहुंच चुका है। अगर खनन तुरंत शुरु नहीं की गई तो इन लोगों का जीवन बर्बाद हो जाएगा और परेशानी की वजह से इससे जुड़े लोग दिल का दौरा पड़ने से मरने लगेंगे।'

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