शव दफ़नाने पर फैसला, गोंड समाज का अपनी पुरानी परंपराओं की ओर लौटने की दिशा में एक कदम

by M. Nuruddin 1 year ago Views 2225

ये किसी टाइम लाइन में लौटने की कोशिश नहीं बल्कि ये पुरानी ग़लतियों को सुधारने की एक कोशिश है...

Decision on burial of bodies, a step towards retur
आदिवासी समुदाय अपनी पुरानी परंपराओं की तरफ अपने क़दम बढ़ाना शुरु कर दिया है। हाल ही में छत्तीसगढ़ में रहने वाले आदिवासियों के ही गोंड समाज ने अपनी परंपरा के मुताबिक़ कुछ फैसले लिए, जिसे उनके प्राकृतिक प्रेम और अपने सामाजिक नियमों की ओर लौटने के तौर पर देखा जा रहा है।

गोंड आदिवासियों की एक महासभा में फैसला लिया गया है कि गोंड समाज में अब शवों को जलाया नहीं जाएगा, बल्कि उन्हें दफनाया जाएगा। इस गोंड महासभा और युवक युवती परिचय सम्मेलन में सामाजिक और पारिवारिक कार्यक्रमों में शराब पर भी पाबंदी का प्रस्ताव पास किया गया है। इनके अलावा गोंड समाज में हुए विभाजनों को भी समाप्त करने का फ़ैसला लिया गया।


आदिवासी समुदाय को करीब से देखने वाले जानकार बताते हैं कि गोंड समाज के ये फैसले पर्यावरण संरक्षण की ओर एक महत्वपूर्ण क़दम हैं। पिछले कुछ सालों में पेड़ों की कटाई तेज़ी से बढ़ी है। शवों को जलाने में भी बड़ी मात्रा में लकड़ी का इस्तेमाल होता है। ऐसे में पेड़ों को बचाने के लिहाज़ से यह एक अहम फैसला है।

कहा जाता है कि आदिवासी समुदाय में शवों को दफनाने की परंपरा बहुत पुरानी है। लेकिन हिंदू धर्म के प्रभाव में आकर कुछ इलाकों में शवों को दफनाने की बजाय जलाने की परंपरा शुरु हो गई। अब इस फैसले से उन समुदायों पर भी असर पड़ेगा। लंबे समय से हिंदू समुदाय का हिस्सा माने जाने वाले आदिवासी समुदाय के इस फैसले को हिंदू संगठन आरएसएस एक षड्यंत्र के तौर पर देख रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ छत्तीसगढ़ में संघ के प्रचार प्रमुख कनीराम नंदेश्वर का कहना है कि ‘अगर किसी परिवार में अग्नि संस्कार की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है, ऐसे में अचानक इस तरह के फैसले लिए गए हैं तो यह कोई साज़िश होगा या कुछ सोच कर लिया गया होगा। हमने कहा है कि समाज प्रमुखों को इस पर बैठक कर ख़ुद तय करना चाहिए।’

ग़ौरतलब है कि आदिवासी समुदाय के धर्म को लेकर पहले भी चर्चाएं होती रही है। आदिवासी समुदाय अपने आपको हिंदू नहीं मानते बल्कि वो अपने आपको ‘प्राकृति पूजक’ बताते हैं। इसको लेकर पिछले महीने 21 फरवरी को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में छात्रों की ओर से आयोजित एक कांफ्रेंस में दिए राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के एक बयान पर बहस छिड़ गई। 

इस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा था, ‘आदिवासी कभी भी हिन्दू नहीं थे, न हैं। इसमें कोई कंफ्यूज़न नहीं है। हमारा सब कुछ अलग है। हम अलग हैं, इसी वजह से हम आदिवासी में गिने जाते हैं। हम प्रकृति पूजक हैं।’ आदिवासी समुदाय के लोग दिल्ली तक में धरना-प्रदर्शन करते रहे हैं और अपनी पहचान को लेकर लंबे समय से लड़ाई लड़ रहे हैं।

बात अगर छत्तीसगढ़ राज्य की करें तो यहां कई तरह की जनजातियां रहती हैं। इन्हीं में एक हैं गोंड जाति। ये राज्य का सबसे बड़ा जनजाति समूंह है। राज्य की कुल आदिवासी आबादी में 30 फीसदी गोंड जाति के लोग हैं। ये राज्य के कवर्धा, राजनांदगांव, कांकेर, महासमुंद, गरियाबंद, दंतेवाड़ा, बस्तर और रायगढ़ ज़िलों में बहुतायत में पाए जाते हैं। 

जानकार बताते हैं कि इस क्षेत्र में जनजातियों के रहने का इतिहास बहुत पुराना है। गोंड समाज ने जो फैसले लिए हैं, दरअसल इसके ज़रिए वे अपनी परंपरा की ओर लौटने की कोशिश कर रहे हैं। ये किसी टाइम लाइन में लौटने की कोशिश नहीं बल्कि ये पुरानी ग़लतियों को सुधारने की एक कोशिश है। 

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