मैनुअल स्केवेंजिंग में मौतों से फिर इनकार, सीवर की सफाई में हर रोज़ तीन मौतें !

by M. Nuruddin 10 months ago Views 1556

Deaths in manual scavenging denied again, three de
देश में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई एक जोखिम भरा काम है और मज़दूर चंद रुपयों के लिए बिना सुरक्षा उपकरण के जान जोखिम में डालकर सेप्टिक और सीवर टैंक की सफाई करने उतर जाते हैं। सुरक्षा में चूक की वजह से कई कर्मचारियों की मौत भी हो जाती है।

राज्यसभा में सोशल जस्टिस एंड एंपॉवरमेंट मंत्री विरेंद्र कुमार ने बताया है कि सीवर की सफाई के दौरान 941 कर्मचारियों की मौत हो गई है। यानि हर रोज़ कम से कम तीन कर्मचारियों की मौत दर्ज की गई।


मंत्रालय से सांसद बिनॉय विस्वम ने मेनुअल स्केवेंजिंग की वजह से मौतों का आंकड़ा पूछा था लेकिन मंत्री विरेंद्र कुमार ने ऐसी मौतों से इनकार किया है। मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक़ मैनुअल स्केवेंजिंग के दौरान देश में एक भी कर्मचारियों की मौत नहीं हुई है।

हालांकि सेप्टिक टैंक की सफाई में लगे कर्मचारियों की मौतों का राज्यवार आंकड़ा दिया गया है जिसके मुताबिक़ तमिलनाडु पहले नंबर पर है जहां सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई में लगे कर्मचारियों की सबसे ज़्यादा मौतें दर्ज की गई है।

मसलन तमिलनाडु में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करने वाले 213 कर्मचारियों की मौतें हुई है। इसके बाद दूसरे नंबर पर गुजरात है जहां ऐसी 153 मौतें दर्ज की गई है। इनके अलावा उत्तर प्रदेश में 104, दिल्ली में 98 और कर्नाटक में 84 कर्माचारियों की मौत हो गई।

मंत्रालय ने बताया है कि लॉकल ऑथोरिटी द्वारा साल 2013 और 2018 के दौरान किए गए सर्वे में पाया गया कि देश में 58,098 लोग मैनुअल स्केवेंजिंग से जुड़े थे। पूछे जाने पर क्या इससे जुड़े लोगों की मौत भी हुई है ? मंत्रालय ने जवाब दिया, ‘मैनुअल स्केवेंजिंग की वजह से मौत की कोई रिपोर्ट नहीं है, लेकिन हमारे पास सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई में लगे श्रमिकों की मौत के बारे में रिपोर्ट है।”

मौतें नहीं होने के दावे ग़लत !

इससे पहले सोशल जस्टिस एंड एंपॉवरमेंट मंत्रालय के राज्य मंत्री रामदास अठावले ने राज्यसभा में दावा किया था कि मैनुअल स्केवेंजिंग के दौरान एक भी मौतें दर्ज नहीं की गई है। मंत्रालय से पांच सालों का आंकड़ा पूछा गया था लेकिन मंत्री रामदास अठावले ने इससे इनकार किया था।

हालांकि सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन के मुताबिक़, साल 2016 और साल 2020 के बीच मैनुअल स्कैवेंजिंग’ की वजह से देशभर में 472 और साल 2021 में अबतक 26 मौतें दर्ज की गईं। सफाई कर्मचारी आंदोलन मैनुअल स्कैवेंजिंग के उन्मूलन के लिये एक मुहिम है।

संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्ति को मानवीय गरिमा के साथ 'जीवन जीने के अधिकार' की गारंटी देता है। यह अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों के लिये है। मैनुअल स्कैवेंजिंग को "सार्वजनिक सड़कों और सूखे शौचालयों से मानव मल को हटाने, सेप्टिक टैंक, नालियों और सीवर की सफाई" के रूप में परिभाषित किया गया है।

जाति, वर्ग और आय के विभाजन से प्रेरित

मैनुअल स्कैवेंजिंग की प्रथा जाति, वर्ग और आय के विभाजन से प्रेरित है। यह प्रथा भारत की जाति व्यवस्था से जुड़ी हुई है, जहाँ तथाकथित निचली जातियों से ही इस काम को करने की उम्मीद की जाती है।

“मैनुअल स्कैवेंजर्स का रोज़गार और शुष्क शौचालय का निर्माण (निषेध) अधिनियम, 1993” के तहत देश में हाथ से मैला ढोने यानि मैनुअल स्केवेंजिंग की प्रथा को प्रतिबंधित किया गया है, हालाँकि इसके साथ जुड़ा कलंक और भेदभाव अभी भी जारी हैं।

समस्या

कई अध्ययनों में राज्य सरकारों द्वारा इस कुप्रथा को समाप्त कर पाने में असफलता को स्वीकार न करना और इसमें सुधार के प्रयासों की कमी को एक बड़ी समस्या बताया गया है।

कई स्थानीय निकायों द्वारा सीवर सफाई जैसे कामों के लिये निजी ठेकेदारों से एग्रिमेंट किया जाता है। इनमें से कई फ्लाई-बाय-नाइट ऑपरेटर", सफाई कर्मचारियों के लिये उचित दिशानिर्देश और नियम नहीं बताते हैं। ऐसे में सफाई के दौरान किसी कर्मचारी की मौत होने पर इन कंपनियों या ठेकेदारों द्वारा मृतक से किसी भी प्रकार का संबंध होने से इनकार कर दिया जाता है।

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