सीपीआई (एमएल) ने बिहार में एक भी सवर्ण को नही दिया टिकट

by GoNews Desk 3 years ago Views 3035

CPI (ML) did not give tickets to any upper castes
वामपंथी दलों पर सवर्ण वर्चस्व के तमाम आरोपों के बीच बिहार से एक दिलचस्प ख़बर है। बिहार के सबसे बड़े वामपंथी दल समझी जाने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी सीपीआई (एमएल) ने इस बार किसी सवर्ण को विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं दिया है।

सीपीआई (एमएल) अकेली कम्यनिस्ट पार्टी है जिसके पिछले विधानसभा में सदस्य मौजूद थे। पिछले चुनाव में उसके तीन विधायक जीते थे। इस बार बिहार में वामपंथी, यूपीए के साथ महागठबंधन का हिस्सा हैं। उन्हें 29 सीटें मिली हैं जिनमें 19 सीपीआई (एमएल), छह सीपीआई और चार सीपीएम के हिस्से गयी हैं।


सीपीआई (एमएल) ने अपने सभी 19 उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है जिनमें पिछड़ जातियों से 9, अति पिछड़ी जातियों से 2, दलित जाति के पाँच के अलावा तीन मुस्लिम समुदाय के नेताओं को प्रत्याशी बनाया गया है। पिछड़ों में पाँच कुशवाहा जबकि चार यादव उम्मीदवार हैं। इस सूची में एक भी सवर्ण नहीं है।

सीपीआई(एमएल) अरसे तक भूमिगत पार्टी थी और मध्य बिहार में सामंतों के ख़िलाफ़ हथियारबंद संघर्ष के लिए जानी जाती थी। दलितों और पिछड़ों में ही उसका मुख्य आधार था। लेकिन बीती सदी के नवें दशक में इस पार्टी ने संसदीय रास्ता चुना और हथियारबंद संघर्ष को तिलांजलि दे दी। यह वही दौर था जब हिंदी पट्टी में सामाजिक न्याय के नाम पर पिछड़ी जातियों का उभार हुआ था। बिहार में लालू यादव मुख्यमंत्री थे।

लेकिन जब माले के नाम से मशहूर सीपीआई (एमएल) के महासचिव विनोद मिश्र थे और चुनावी राजनीति में कूदते ही सामाजिक न्याय का झंडा बुलंद करने वाली पार्टियों ने उस पर सवर्ण वर्चस्व का आरोप लगाना शुरू कर दिया था। बिहार की परंपरागत बड़ी पार्टी सीपीआई पहले से ही सवर्ण वर्चस्व को लेकर निशाने पर थी। इस प्रचार ने वामपंथियों के जनाधार को काफ़ी कमज़ोर किया, हालाँकि उनके कार्यक्रम लगातार उन सामंती शक्तियों के ख़िलाफ़ थे जो दलितों के उत्पीड़न में अव्वल थे।

माले अरसे तक आरजेडी पर सामंतों के हितचिंतक होने का आरोप लगाती रही और कई ज़िलों में आमने सामने की लड़ाई भी हुई। पार्टी के नेता और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर उर्फ़ चंदू की हत्या का आरोप आरजेडी के सांसद शहाबुद्दीन पर ही लगा था। बहरहाल, बदले हालात में पार्टी आरजेडी के साथ गठबंधन को मजबूर हुई है, लेकिन इस बाची पार्टी के सामाजिक जामे में काफ़ी फ़र्क़ आया है। एक भी सवर्ण को टिकट न दिया जाना बताता है कि पार्टी की प्राथमिकता क्या है।

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