COP26: दुनिया ने दुनिया को बचाने के लिए क्या किया और आगे क्या करेगी ?

by GoNews Desk 6 months ago Views 2049

COP26 जलवायु शिखर सम्मेलन में किन मुद्दों पर समहति बनी ?

COP26: What did the world do to save the world and
ब्रिटेन एक COP26 शिखर सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा है जिसे जलवायु परिवर्तन को नियंत्रण में लाने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 12 नवंबर तक आयोजित होने वाले COP26 शिखर सम्मेलन हमारे दैनिक जीवन में बड़े बदलाव ला सकती है। एक्सपर्ट मानते हैं कि दुनिया को क्लामेट के बुरे प्रभाव से बचाने का यही एकमात्र मौका है।

COP26 क्या है और क्यों हो रहा है ? 


हमारे कोयले, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से होने वाले उत्सर्जन की वजह से दुनिया गर्म हो रही है। रिसर्च रिपोर्टों के मुताबिक़ दुनिया का तापमान फिलहाल 1.2 डिग्री सेल्सियस पर है और इसके इस सदी के अंत तक 1.5 डिग्री सेल्सियस पर सीमीत करने की कोशिश है।

हालांकि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि चाहे कोई भी कदम उठा लिए जाएं लेकिन दुनिया का इस सदी के अंत तक 2 डिग्री सेल्सिस से ज़्यादा गर्म होना तय है।

जलवायु परिवार्तन से जुड़ी चरम मौसम की घटाएं जैसे बहुत ज़्यादा और अचानक बाढ़ का आना, जंगलों में आग लगना जैसी घटनाएं तेज़ गो गई है।

रिसर्च रिपोर्टों में इस बात की भी जानकारी दी गई कि पिछला दशक रिकॉर्ड गर्म दर्ज किया गया और COP26 क्लाइमेट समिट में दुनिया की सरकारें इस बात को लेकर सहमति जता रही हैं कि तत्काल इससे बचने के लिए कार्रवाई की ज़रूरत है।

पेरिस क्लाइमेट समझौता क्या है ?

पेरिस में साल 2015 में हुए क्लाइमेट समझौते में इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि प्रत्येक देश अपने स्वयं के उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य निर्धारित करने और महत्वाकांक्षाओं को बढ़ाने के लिए हर पांच साल में इसकी समीक्षा करने पर सहमति बनी थी।

2015 के पेरिस समझौते में वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने की कोशिशों और पूर्व औद्योगिक समय से इसे 2.0 के नीचे रखने की दिशा में काम करने पर सहमित बनी थी।

पेरिस समझौते में विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन को कम करने, लचीलेपन को म़जबूत करने और जलवायु प्रभावों के अनुकूल होने की क्षमता बढ़ाने के लिए फंड मुहैया कराने पर भी सहमति बनी थी।

पेरिस समझौता एक तरीके से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि है। यह 4 नवंबर 2016 को लागू हुआ था।

2015 के पेरिस समझौते में भी दुनिया के देशों ने 2050 तक नेट ज़ीरो के लक्ष्य को हासिल करने पर सहमति जताई थी। हालांकि तब भारत ने कार्बन उत्सर्जन के नेट ज़ीरो के लिए कोई योजना पेश नहीं की थी।

COP26 जलवायु शिखर सम्मेलन में किन मुद्दों पर समहति बनी ?

ब्रिटेन के ग्लासगो में जारी COP26 जलवायु शिखर सम्मेलन में दुनिया के लगभग देशों ने नेट ज़ीरो के लिए 2050 तक का लक्ष्य तय किया है। COP26 में भारत ने शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए 2070 तक का समय तय किया है और इसके लिए योजना भी बताई है।

जबकि पड़ोसी देश चीन ने नेट ज़ीरो का लक्ष्य हासिल करने के लिए 2060 तक का समय तय किया है लेकिन चीन की तरफ से इसको हासिल करने के लिए कोई रास्ते नहीं बताए गए हैं। दुनिया में चीन सबसे ज़्याजा कार्बन उत्सर्जन करने वाला देश है जिसने साल 2019 में 11,535 मेगाटन कार्बन का उत्सर्जन किया था।

COP26 समिट में एक बार फिर विकसित देश, विकासशील देशों को हर साल 100 अरब डॉलर का फंड मुहैया कराने पर भी सहमत हुए हैं। इससे विकासशील देशों को जलवायु के अनुकूल होने में मदद मिलेगी।

100 अरब डॉलर का फंड मुहैया कराने का लक्ष्य अधूरा

फंड मुहैया कराने के मुद्दे पर साल 2009 में ही यह सहमति बनी थी कि विकसित देश, विकासशील देशों को प्रत्येक साल (2020) तक 100 अरब डॉलर का फंड मुहैया कराएगा, लेकिन यह लक्ष्य अभी तक पूरा नहीं हो सका है।

आंकड़े देखें तो पता चलता है कि साल 2019 में क्लाइमेट चेंज के प्रभावों से बचने के लिए करीब 80 अरब डॉलर ख़र्च किए गए और यह लक्ष्य साल 2023 तक भी बमुश्किल पूरा हो सकता है।

जबकि, युनाइटेड नेशन ने अपनी हालिया एक रिपोर्ट में इस बात को क़बूला था कि फंड मुहैया कराने का लक्ष्य 2023 तक पूरा नहीं हो सकता। साथ ही 2025 तक नया और एक महत्वाकाक्षी लक्ष्य तय करनी की अपील की गई थी।

ग़ौरतलब है कि भारत उन देशों में शामिल है जिन्हें क्लाइमेट चेंज के अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए फंड की ज़रूरत है।

पिछले दिनों भारत ने एक विकासशील देश होने और कोई क्लाइमेट फंड नहीं होने का हवाला देकर विकासशील देशों से एक ट्रिलियन डॉलर की मांग की थी, ताकि अपने लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में काम किया जा सके।

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