क्या जाति जनगणना से बीजेपी को चुनाव में नुक़सान होगा ?

by M. Nuruddin 10 months ago Views 1727

Caste Census Vexing Issue For BJP?
देश की जनगणना में जाति के आधार पर गिनती की मांग लिए विपक्षी और क्षेत्रीय नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव ने कहा, "जाति की जनगणना एक ऐतिहासिक, गरीब समर्थक उपाय होगा।" बीजेपी सरकार के ऐसा नहीं करने से ही देश में राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई है।

हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था लगभग 2000 साल पहले की है। यह देखा गया है कि देश में ब्राम्हणों या पुजारियों की जाति हमेशा उच्च रही है जबकि दलितों जिन्हें अछूत माना जाता रहा है और आदिवासियों को इंडियन कास्ट सिस्टम में सबसे नीचे रखा जाता है। इनके अलावा भी कई सारी जातियां हैं जिनका ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। जातियों को लेकर ऐसी कोई सूची मौजूद नहीं है।


सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बिहार के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुलाक़ात कर जाति जनगणनता की ज़रूरतों से अवगत कराया है। इस दल में ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके सहयोगी जीतन राम मांझी और तेजस्वी यादव भी शामिल रहे। मुलाक़ात के बाद नीतीश कुमार ने कहा कि सभी लोगों ने अपनी बातों को प्रधानमंत्री के सामने रखा और पीएम ने उनकी बात को ध्यान से सुना है। नीतीश ने कहा कि पीएम से मांग की गई कि इस मामले में जल्द से जल्द क़दम उठाया जाए।

तेजस्वी यादव ने कहा कि मंडल कमीशन के बाद ही पता चला कि देश में हज़ारों जातियां हैं। उन्होंने कहा कि जब जानवरों, पेड़-पौधों की गिनती होती है तो इंसानों की भी होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि आख़िर जाति जनगणना क्यों नहीं होनी चाहिए और जब जनगणना ही नहीं होगी तो लोगों के लिए कल्याणकारी योजनाएं कैसे बनेंगी।

विपक्षी दल तो जाति जनगणना की मांग कर ही रहे हैं, बीजेपी के ही गठबंधन सहयोगी और कई बीजेपी सांसद भी इसके पक्ष में हैं। समझा जाता है कि इसको लेकर मोदी सरकार पर काफ़ी दबाव है। बकौल नीतीश कुमार, प्रधानमंत्री मोदी के साथ मीटिंग में दस दलों के नेता शामिल हुए।

देश में निचली और मध्यम जातियों का एक समूह है, जिनके बारे में माना जाता है कि वे आबादी का लगभग 52 फीसदी है, जिन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग या ओबीसी के रूप में भी जाना जाता है। भारत की जनगणना, जो हर 10 साल में होती है, में हमेशा दलितों और आदिवासियों की आबादी दर्ज की जाती है, लेकिन इसमें कभी भी ओबीसी की गिनती नहीं की गई।

अब, भाजपा के सहयोगी दलों समेत कई राजनीतिक दल जाति जनगणना की मांग कर रहे हैं और ओबीसी की गिनती अनिवार्य रूप से किए जाने की मांग कर रहे हैं। जबकि सरकार इससे पहले ही इनकार कर चुकी है। सत्ताधारी भाजपा ने कहा है कि वह "नीति के आधार पर" जाति की गणना नहीं करेगा।

अब सवाल है कि आख़िर भारतीय जनता पार्टी जाति जनगणना कराने के पक्ष में क्यों नहीं है। इसपर जानकार बताते हैं कि अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और ऐसे में केन्द्र की मोदी सरकार ऐसे किसी पहलु को छूने से बच रही है जिससे चुनाव में पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी हो। ख़ासकर ऐसे दौर में जब बीजेपी को पश्चिम बंगाल समेत कुछ राज्यों में हार का सामना करना पड़ा।

ग़ौरतलब है कि ग्राम परिषद के चुनाव से लेकर संसदीय चुनाव तक में जाति एक महत्वपूर्ण कारक है। इनमें भी अगर उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां जाति तो और भी बड़ा मुद्दा है। ऐसे में अगर जाति के आधार पर गणनना होती है तो इससे वोटों में दरार पैदा हो सकती है। जबकि इसी चीज़ को मज़बूत करने के लिए बीजेपी ने सालों से जतन किए हैं और कामयाबी भी हासिल की है। वजह यह भी है कि अगर ऐसा होता है तो इससे हिंदुत्व के नाम पर विभाजन की राजनीति भी बीजेपी के लिए मुश्किल हो सकती है।

निचली जातियों का कहना है कि पहचान एक ऐसी वास्तविकता है जिससे वे हर रोज़ जूझते हैं और सिर्फ विशेषाधिकार प्राप्त लोग ही जाति की अनदेखी कर सकते हैं। आलोचकों का कहना है कि ओबीसी की गिनती से पता चलता है कि उनकी आबादी का कितना बड़ा हिस्सा है, लेकिन इसमें उच्च जातियां कितनी कम हैं, जो धन और शिक्षा के सदियों के विशेषाधिकार के कारण राजनीति और नौकरशाही पर हावी हैं।

दरअसल, 1872 में भारत में जनगणना अभियान शुरू करने वाले अंग्रेजों ने 1931 तक सभी जातियों की गिनती कर रहे थे। हालांकि ओबीसी की गिनती कभी नहीं हुई। साल 1941 में भी जाति के आधार पर गणनना की गई लेकिन डेटा पब्लिश नहीं किए गए। इसके बाद 1947 में देश आज़ाद हो गया। इसके बाद साल 1951 में आज़ाद भारत की पहली जनगणना में सिर्फ दलितों और आदिवासियों को गिना गया जिन्हें अनुसूचित जाति और जनजाति भी कहा जाता है। बाकि सभी की जाति को सामान्य रूप से चिन्हित किया गया था।

ताज़ा वीडियो