क्या मोदी लोकलुभावनवाद की बजाय स्वास्थ्य निवेश बढ़ाने की चुनौती पर काम कर सकते हैं?

by GoNews Desk 7 months ago Views 1748

शांति, समृद्धि का पहला घटक है...

Can Modi Rise to the Challenge of Increasing Healt
स्टॉक होम इंटरनेश्नल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ने वैश्विक सैन्य ख़र्च को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें बताया गया है कि साल 2020 के दौरान अमेरिका और चीन के बाद सैन्य ख़र्च में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर रहा। इस दौरान भारत का सैन्य ख़र्च फ्रांस, ब्रिटेन, सऊदी अरब और जापान से भी ज़्यादा 72.9 अरब डॉलर रहा। यह उस दौरा की बात ही जब देश में कोरोना संक्रमण से 200,000 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं। आंकड़े देखें तो भारत सरकार का स्वास्थ्य पर ख़र्च इस विशाल सैन्य बजट का मात्र एक छोटा सा हिस्साभर है।

साल 2021-22 के बजट में मोदी सरकार ने स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए जीडीपी का महज़ 0.38 फीसदी हिस्सा ही आवंटित किया जो कुल बजट का 2.16 फीसदी है। जबकि कुल बजट का 14 फीसदी हिस्सा सरकार ने अकेले रक्षा मंत्रालय के लिए आवंटित किए जो अमेरिका के बाद कुल जीडीपी का 2.45 फीसदी है।


अब आलोचक यहां यह तर्क देने लगेंगे कि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है और यह संघीय सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि ज़्यादातर राज्य ऐसे हैं जो भारी घाटे में रहे हैं और राज्यों के पास महामारी के दौरान स्वास्थ्य ख़र्च बढ़ाने का कोई विकल्प भी नहीं है। इस बीच अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन की आपूर्ति और कोविड वैक्सीन जैसे संसाधनों के लिए लगातार संघर्ष जारी है। अस्पतालों में बुनियादी सुविधा नहीं होने से हज़ारों लोग मारे जा रहे हैं।

इनके अलावा संघीय सरकार ने वैक्सीन आवंटन को भी एक तरह से नियंत्रित करना शुरु कर दिया है और इससे पहले राज्यों को नए टैक्स सिस्टम जीएसटी से होकर भी गुज़रना है। दो तुलनात्मक रूप से समृद्ध राज्यों, दिल्ली और महाराष्ट्र में मौजूदा समय में हालात बदतर हैं और पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार दैनिक विवादों में उलझी है या उलझाने में लगी हुई है। अगर रक्षा आवंटन से सिर्फ 2 फीसदी हिस्सा ही शिफ्ट किया जाए तो उससे इस महामारी से लड़ने के लिए मौजूद संसाधनों को दोगुना किया जा सकता है।

प्राथमिकता ही समय की आवश्यकता है, लेकिन इसके लिए सरकार को सबसे पहले अपने पड़ोसियों के साथ सेल्फ क्रिएटेड ख़तरे को कम करना होगा और एक शांतिपूर्ण राजनीतिक वातावरण बनाना होगा। 2019 के चुनाव अभियान के दौरान सत्तारूढ़ भाजपा का जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सैन्य काफिलों पर हुए हमले और उसके बाद भारत की तरफ से पाकिस्तान में की गई कथित जवाबी कार्रवाई, ही असल मुद्दे रहे।

इस रणनीति से पार्टी को भारी फायदा भी हुआ और लोकसभा में एक तिहाई वोट हासिल करने में मोदी कामयाब भी हुए। इसके बाद चीन के साथ तनाव, जो पाकिस्तान का एक सहयोगी है, दोनों देशों ने सैन्य और व्यापार मोर्चों पर आगे बढ़े हैं। नतीजतन पाकिस्तान लगातार अपनी रक्षा तैयारियों में जुटा है और इसके लिए उसे पूरी मदद भी मिल रही है।

शांति, समृद्धि का पहला घटक, जिसकी शुरुआत अब की जानी चाहिए ताकि देश अपने लोगों की जान बचाने के लिए पर्याप्त संसाधन जुटा सके। लेकिन यहां लाइफ सेविंग मेडिसिन और इक्वीपमेंट्स की जगह अगर सेना का उल्लेख किया जाए तो देश के करोड़ों प्रधानमंत्री समर्थकों के लिए एक रेड रैग यानि क्रोध उत्पन्न करने वाला जैसा साबित होगा।

दिल दहला देने वाली तस्वीरों, गाड़ी, रिक्शा और कार के भीतर ऑक्सीजन के अभाव में मारे जा रहे लोग और कार पार्किंग को शमसान में बदलने की तस्वीरों ने दुनिया का ध्यान अपनी तरफ आकर्शित किया है, इस बीच क्या श्री मोदी शांति की चुनौती के लिए आगे आ सकते हैं ?

जैसा कि चीन और पाकिस्तान दोनों ‘दुश्मन’ पड़ोसी देश भारत को संक्रमण के इस हमले से उबरने में मदद की पेशकश की और वैश्विक शक्तियों ने भारत को स्वास्थ्य आपूर्तियां भेजे हैं, यह शायद भारतीयों के लिए शांति और समृद्धि के दोहरे लक्ष्यों को प्राप्त करने का सही समय है।

महान नेतृत्व अंतत: उन लोगों को बचाने के लिए होता है जो उसे चुनता है, क्या मोदी इसके लिए आगे आ सकते हैं ? दुनिया इसके इंतज़ार में है।

 

(यह लेख गोन्यूज़ के एडिटर इन चीफ पंकज पचौरी द्वारा लिखी गई है और नूरूद्दीन ने इसे ट्रांसलेट किया है।)

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