ब्लैक मार्केटिंग: दूसरी लहर में Ambulance के लिए 500 फीसदी ज़्यादा कीमत वसूली

by Sarfaroshi 3 months ago Views 3252

coronavirus : second wave

कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान न सिर्फ बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी जान गंवाई बल्कि इसकी गाज आम आदमी की जेब पर भी पड़ी। ध्वस्त होते स्वास्थ्य ढांचे के बीच अपने परिजनों को बचाने के लिए लोगों को मामूली दामों में मिलने वाली दवाइयों और कोरोना से जुड़ी दूसरी सेवाओं के लिए 500 गुना अधिक दाम चुकाने पड़े। कम्यूनिटी सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म लोकलसर्किल के हाल ही में किए गए एक सर्वे से पता चला कि देश में 70 फीसदी लोगों ने एंबुलेंस, 36 प्रतिशत ने ऑक्सीजन, 19 फीसदी ने दवाइयों जबकि 13 प्रतिशत लोगों ने आरटी-पीसीआर टेस्ट के लिए अधिक दाम दिए।

 भारत में 16 मार्च को कोरोना संक्रमण के 16,000 केस दर्ज हुए थे जबकि अगले 45 दिनों में यह आंकड़ा 25 गुना ज़्यादा बढ़ 4,02,000 पर पहुंच गया था। इतनी जल्दी बड़े मामलों का बोझ भारतीय हेल्थ सिस्टम सहन नहीं कर पाया और ऑक्सीज कंस्ट्रेटर, एंबुलेंस और दवाइयों की भारी कमी का ब्लैक मार्केटिंग करने वालों ने फायदा उठाया। 

लोकलसर्कल का यह सर्वे देश के 389 जिलों में किया गया जिसमें कुल 38,000 लोगों ने भाग लिया। सर्वे के मुताबिक 36 फीसदी लोगों ने कोविड की दूसरी लहर के दौरान कोरोना से जुड़ी सप्लाई जैसे ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, ऑक्सीमीटर और सिलेंडर आदि के लिए MRP से ज़्यादा पैसे दिए।

इनमें से 14 फीसदी लोग ऐसे भी थे जिन्होंने इन चीज़ों के लिए तय दाम से 3 गुना ज़्यादा पैसे दिए। कोरोना संक्रमण के दौरान एक बड़ी समस्या ऑक्सीजन की कमी थी। एक अस्पताल में ऑक्सीजन खत्म होने के चलते जब मरीजों को एंबुलेंस में दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट किया तो उसके लिए भी लोगों ने पांच गुना ज़्यादा तक दाम दिए। 

सर्वे के मुताबिक 70 फीसदी लोगों ने एंबुलेंस के लिए रेगुलर दाम से अधिक दाम दिए। यहां तक 10 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने एंबुलेंस सेवा के लिए 100-500 प्रतिशत जबकि 50 फीसदी ने 500% या उससे अधिक कीमत चुकाई। सर्वे बताता है कि दूसरी लहर के दौरान टोसीलिज़ुमैब, रेमडेसिविर और एएमडी फैबीफ्लू जैसी दवाओं की डिमांड काफी बढ़ गई थी। 19 प्रतिशत लोगों ने इन दवाओं के लिए अधिक कीमत दी जबकि इनमें से 10 फीसदी रिसपोंडेंट ने कहा कि उन्हें दवाइयों के लिए 10 प्रतिशत से ज़्यादा दाम देने पड़े।


यह वह सप्लाई हैं जिनकी लोगों को कोरोना से संक्रमित होने के दौरान ज़रूरत पड़ी। इसके अलावा भी लोगों को सिर्फ यह जानने के लिए के लिए कि उन्हें संक्रमण है या नहीं, इसके लिए भी कई गुना ज़्यादा कीमत देनी पड़ी। सर्वे में भाग लेने वाले 19 प्रतिशत लोगों ने कहा कि निजी लैब और अस्पतालों ने उनसे Rt-PCR टेस्ट के लिए ज़्यादा पैसे लिए।  

सर्वे के आंकड़े बतातें हैं कि देश में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर किस स्तर तक ज़रूरी उपकरणों की ब्लैक मार्केटिंग की गई। आम तौर पर 300 रूपये में मिलने वाले ऑक्सीमीटर के लिए लोगों ने 1500 रूपये तक चुकाए। 33,000 में मिलने वाले एक ऑक्सीजन कंसंट्रेटर को लोगों ने 1,00,000 तक की कीमत में भी खरीदा।

एक ऑक्सीजन सिलेंडर को फिर से भराने के लिए लोगों ने 400 फीसदी तक अधिक दाम दिए जबकि एंबुलेंस ने सिर्फ 25 किलोमीटर तक का ही सफर तय करने के लिए लोगों से 42,00 रूपये तक वसूले।सर्वे ने सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की भी पोल खोली है और यह इससे पता चलता है कि सर्वे में सिर्फ 9 फीसदी लोगों ने माना कि उन्हें सरकारी मदद मिली थी और उनका मुफ्त कोविड टैस्ट हुआ। 

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