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विधानसभा चुनाव 2021: 4 राज्यों और 1 केन्द्रशासित प्रदेश में चुनावी तारीख़ों का ऐलान

by GoNews Desk 1 month ago Views 4279

Assembly election 2021: Declaration of election da
पश्चिम बंगाल विधानसभा

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव की तारीख़ों का ऐलान चुनाव आयोग ने कर दिया है। राज्य में 27 मार्च से आठ चरणों में मतदान होंगे। पहले चरण में 27 मार्च को 38 सीटों पर मतदान होगा और 1 अप्रैल को दूसरे चरण में 30 सीटों पर वोटिंग होगी। इनके अलावा 6 अप्रैल को तीसरे चरण में 31 सीट, 10 अप्रैल को चौथे चरण में 44 सीट और 17 अप्रैल को पांचवें चरण में 45 सीटों पर वोटिंग होगी।


वहीं आख़िरी के तीन चरणों में 22 अप्रैल को 43 सीट, 26 अप्रैल को 36 सीट और 29 अप्रैल को 35 सीटों पर वोटिंग होगी। चुनाव आयोग इनके परिणाम 2 मई को घोषित करेगा।

माना जा रहा है कि इसबार राज्य में मेन टक्कर भाजपा और तृणमुल कांग्रेस में है। हालांकि अगर विधानसभा में संख्या देखें तो पिछले चुनाव में बीजेपी का मैदान से सफाया हो गया था। पार्टी महज़ तीन सीटों पर जीत दर्ज कर पाई थी। वहीं तृणमुल कांग्रेस ने 209 सीटें जीती थी और जीजेएम के दो विधायकों के साथ सरकार बनाई थी।

अगर विपक्ष की संख्या देखें तो अभी विधानसभा में कांग्रेस के 23, सीपीएम के 19, लेफ्ट पार्टी के दो, आरएसपी के दो और अन्य के 24 विधायक हैं। हालांकि माना जा रहा है कि इसबार में राज्य में यह संख्या बदल सकती है।

 

तमिलनाडु विघासभा

चुनाव आयोग ने तमिलनाडु विघासभा चुनाव के लिए 6 अप्रैल को मतदान की योजना बनाई है। राज्य में एक ही चरण में 234 सीटों पर मतदान होंगे। सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेश के साथ ही 2 मई को इसके परिणाम भी घोषित होंगे।

तमिलनाडु में जे. जयललिता और एम करुणानिधी के निधन के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव है। राज्य में एआईएडीएमके के के.पलानिस्वामी बीजेपी और पीएमके के साथ गठबंधन में सरकार चला रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 2.8 फीसदी था। हालांकि चुनाव-दर-चुनाव राज्य में पार्टी का वोट शेयर बढ़ रहा है। 2011 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर 2.2 फीसदी रहा था।

234 सीटों वाली विधानसभा में एआईएडीएमके गठबंधन के पास अभी 135 विधायक हैं। हालांकि 2011 के विधानसभा चुनाव में एआईएडीएमके गठबंधन के पास 203 विघायक थे।

राज्य की विधानसभा में अगर विपक्षा की संख्या देखें तो डीएमके गठबंधन के 97 विधायक हैं। इनमें कांग्रेस, एमडीएमके, वीसी, सीपीआई और सीपीएम शामिल है। इनके अलावा अन्य के पास विधायकों की संख्या दस है। अगर वोट शेयर की बात करें तो राज्य में कांग्रेस का वोट शेयर 6.4 फीसदी है जो लगातार घट रहा है। 2011 के चुनाव में पार्टी का वोट शेयर 9.3 फीसदी रहा था।

जबकि पिछले चुनाव में डीएमके का वोट शेयर 31.6 फीसदी था और 2011 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 30.1 फीसदी वोट मिले थे। इसबार बीजेपी तमिलनाडु में अपने दम-ख़म के साथ लगी हुई है। पार्टी ने राज्य में एक रथ यात्रा का भी आयोजन किया और अपने अंदाज़ में मतदाताओं को रिझाने की कोशिश में हैं।

केरल विघानसभा

केरल की 140 विघानसभा सीटों पर 6 अप्रैल को मतदान होंगे। चुनाव आयोग ने राज्य में एक ही चरण में मतदान की योजना बनाई है। राजनीति और अन्य मोर्चों के हिसाब से केरल एक अहम् राज्य माना जाता है। केरल एकमात्र राज्य है जहां कम्युनिस्ट पार्टियों की सरकार है। यहां विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी सीपीएम है और पिछले चुनाव में इसका वोट शेयर 26.5 फीसदी रहा था।

अगर केरल विधानसभा में संख्याबल की बात करें तो सत्ताधारी पार्टियों के पास कुल 92 विधायक हैं। इनमें सबसे ज़्यादा सीपीएम के पास 58 विधायक हैं। वहीं सीपीआई के 19 और अन्य एलडीएफ मोर्चों के 15 विधायक हैं। वहीं विपक्ष में बैठी कांग्रेस के 22 और बीजेपी के पास मात्र एक विधायक है।

अगर 2011 विधानसभा चुनाव की बात करें तो कांग्रेस पार्टी ने 38 सीटें जीती थी और आईयूएमएल और अन्य युनाइटेड डमेक्रेकटिक फ्रंट के साथ मिलकर सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। हालांकि तब भी कांग्रेस दूसरी बड़ी पार्टी थी। 2011 के चुनाव में भी सीपीएम ने 45 विधायकों के साथ बड़ी जीत दर्ज की थी। इसबार राज्य में बीजेपी चुनाव के रुख को मोड़ने की कोशिश में है।

राज्य में सबरीमला मंदिर का मसला बहुत पुराना है और बीजेपी इसी के सहारे सत्ता की नैया पार लगाना चाहती है। मामला सुप्रीम कोर्ट में है और बीजेपी 10-50 साल की महिलाओं के लिए सबरीमला के द्वार खोलने के पक्ष में। इससे कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों के लिए ख़तरा मंडरा रहा है। राज्य में हिंदुओं की आबादी सबसे ज़्यादा है। वहीं मुस्लिम और ईसाई की आबादी लगभग 46 फीसदी है। ऐसे में हिंदू वोटरों पर सभी पार्टियों की नज़र है।

असम विधानसभा

असम में भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर जीत की उम्मीद लिए अगर बढ़ रही है। 2016 में पार्टी को अप्रत्याशित जीत मिली थी। राज्य में कभी कांग्रेस पार्टी का दबदबा हुआ करता था लेकिन चुनाव-दर-चुनाव पार्टी का वोट शेयर लगातार घट रहा है।

कांग्रेस पार्टी के दिग्गज रहे तरुण गोगोई की मौत के बाद राज्य में पार्टी कमज़ोर श्रेणी में है। हालांकि बदरूद्दीन अजमल की पार्टी एयूडीएफ के गठबंधन की वजह से मुस्लिम वोट कांग्रेस पार्टी के साथ है। राज्य में बीजेपी ने ज़मीनी स्तर पर खुदको मज़बूत किया है और चुनाव में नए अंदाज़ में दिख रही है। राज्य में पार्टी के बड़े नेता हेमंत बिस्वसरमा ने यहां तक कह दिया की पार्टी को मुस्लिम वोट की ज़रूरत नहीं है।

अगर विधानसभा में संख्या की बात करें तो पार्टी के पास अभी 60 विधायक हैं। इनके अलावा क्षेत्रीय पार्टी बीपीएफ के 12 विधायक हैं। वहीं विपक्षा में कांग्रेस के पास 26 और एयूडीएफ के पास 13 विधायक हैं। यानि राज्य में बीजेपी का वोट शेयर 29.5 फीसदी है जो कांग्रेस से कम है। पिछले चुनाव में कांग्रेस पार्टी का वोट शेयर 31 फीसदी रहा था।

हालांकि 2011 के विधानसभा चुनाव में राज्य में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी। पार्टी ने 78 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। तब बीजेपी के पास मात्र तीन ही विधायक थे। यानि 2011 के चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर 39.4 फीसदी थी। जबकि बीजेपी का वोट शेयर महज़ 11.5 फीसदी था।

अब इस चुनाव में हालात और बदलते नज़र आ रहे हैं। यहां बीजेपी अपनी ध्रुविकरण की राजनीति को और मज़बूत किया है और पार्टी एक अलग अंदाज़ में चुनावी मैदान में है।

पुडुचेरी विधानसभा

पुडुचेरी में कांग्रेस पार्टी की सरकार गिरने के बाद हालात बदल गए हैं। हालांकि सरकार बनाने के लिए कोई भी पार्टी सामने नहीं आई। दरअसल, यहां बीजेपी के एक भी विधायक ऐसे नहीं है जिन्होंने चुनाव जीता हो। विधानसभा में बीजेपी के तीन विधायक मनोनित थे। यहां विधानसभा की 30 सीटें हैं। चुनाव आयोग ने सभी सीटों पर एक साथ 6 अप्रैल को मतदान का ऐलान किया है।

सरकार में एआईएडीएमके तीसरी गठबंधन पार्टी थी। गठबंधन में कांग्रेस और और डीएमके विधायकों के इस्तीफे के बाद वी नारायणसामी सरकार अल्पमत में आ गई थी। बाद में नारायणसामी फ्लोर टेस्ट में फेल साबित हुए और सरकार गिर गई।

पुडुचेरी विधानसभा में कांग्रेस पार्टी के पास 15 विधायक थे लेकिन कई विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था। यहां डीएमके और एआईएडीएमके के दो और चार विघायक हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस पार्टी का वोट शेयर 30.6 फीसदी था। डीएमके का वोट शेयर 8.9 फीसदी और एआईएडीएमके के पास 16.8 फीसदी वोट शेयर था।

वहीं 2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पास महज़ सात विधायक थे और पार्टी का वोट शेयर 26.5 फीसदी था। हालांकि क्षेत्रीय पार्टी एआईएनआरसी के 15 विधायक थे और पार्टी का वोट शेयर 31.8 फीसदी रहा था। हालांकि इसबार के चुनाव में बीजेपी भी अपनी कोशिश कर सकती है और अपने कैंडिडेट उतार सकती है। अब देखने वाली बात होगी की आख़िर सत्ता की चाबी किसे मिलेगी।

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