बिहार के बाद उत्तराखंड सरकार ने भी सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर चेताया! बोलने की आज़ादी पर सवाल!

by M. Nuruddin 1 year ago Views 3214

साफ़ है कि अपने ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों को सरकारें अब एंटीनेशनल बताकर उनका दमन करना चाहती हैं।

After Bihar, Uttarakhand government also warned ab
बिहार सरकार के बाद अब उत्तराखंड सरकार ने भी सोशल मीडिया को लेकर एक नया फरमान जारी किया है। अगर सरकार की नज़र में आपकी सोशल मीडिया पोस्ट ‘एंटी नेशनल’ पाई जाती है तो आपकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। उत्तराखंड की पुलिस ऐसे लोगों पर नज़र रखेगी जो सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर कथित तौर पर ‘एंटी नेशनल’ पोस्ट डालते हैं। इससे पहले बिहार सरकार ने भी सोशल मीडिया की टिप्पणियों को लेकर एक आदेश जारी किया था। साफ़ है कि अपने ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों को सरकारें अब एंटीनेशनल बताकर उनका दमन करना चाहती हैं।

उत्तराखंड के डीजीपी के मुताबिक़ अगर किसी की सोशल मीडिया पोस्ट ‘एंटी नेशनल’ पायी गई तो उसके पासपोर्ट का वेरिफिकेशन नहीं किया जाएगा। साथ ही उसे हथियार का लाइसेंस भी नहीं मिल सकेगा। डीजीपी अशोक कुमार ने कहा, ‘अबतक नियम था कि अगर कोई शख्स सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट डालता है तो पुलिस पहले उसकी काउंसलिंग करती थी और कहती थी कि आगे भविष्य में वह ऐसा न करे। अगर कोई गंभीर मामला होता था तो पुलिस मुक़दमा दर्ज कर लेती थी लेकिन अब  पुलिस इस बात की भी जांच करेगी कि शख्श सोशल मीडिया पर कोई ‘एंटी नेशनल’ पोस्ट तो नहीं डाल रहा है।’


उन्होंने कहा कि, ‘अगर कोई शख्स ऐसा करते पाया जाता है तो पुलिस उसके वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को पूरा नहीं करेगी। पुलिस यह काम तब करेगी जब शख्स पासपोर्ट या किसी हथियार के लिए आवेदन देगा।’ उत्तराखंड पुलिस के एक अन्य अधिकारी ने कहा कि राज्य में सोशल मीडिया पर ‘एंटी नेशनल’ पोस्ट करने वालों की तादाद बढ़ रही है, इसी को देखकर यह फैसले लिए गए हैं। अधिकारी ने कहा कि सोशल मीडिया टीम इस तरह की ‘एंटी नेशनल’ पोस्ट पर कड़ी नज़र रख रही है क्योंकि ऐसी पोस्ट्स क़ानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती हैं।

उत्तराखंड सरकार का यह फरमान बिहार में एक नया आदेश जारी होने के बाद आया है। दरअसल, बिहार की नीतीश सरकार ने आदेश जारी किया है कि, ‘राज्य सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने में मामला दर्ज हुआ तो न तो सरकारी नौकरी मिलेगी और ना ही कोई सरकारी ठेका ही मिल सकेगा।’ आदेश के मुताबिक़ अगर आप किसी तरह के विरोध-प्रदर्शन में शामिल होते हैं तो पुलिस की तरफ से मिलने वाले कैरेक्टर सर्टिफिकेट में इस बात का विशेष रूप से विस्तारपूर्वक ज़िक्र किया जाएगा।

आदेश में यह भी है कि अगर कोई दूसरे ज़िले में विरोध-प्रदर्शन में शामिल होता है तो इस हालत में अलग-अलग ज़िलों से उसके बारे में जानकारी इकट्ठा की जाएगी। अगर किसी ने विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा लिया हो, सरकार के विरोध में सड़क जाम किया हो या क़ानून व्यवस्था की स्थित ख़राब की हो तो नौकरी नहीं दी जाएगी। विपक्ष ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है। राष्ट्रीय जनता दल के नेता और विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने ट्वीट कर नीतीश की तुलना हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाहों से की है।

‘एंटी नेशनल’ का क्या मतलब है ?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तराखंड पुलिस से पूछे जाने पर कि ‘एंटी नेशनल’ पोस्ट का क्या मतलब होगा, पुलिस ने बताया, ‘जो कोई भी राष्ट्रीय एकता और अखंडता के खिलाफ लिख रहा है, वह एंटी नेशनल है।’ जबकि क़ानूनी तौर पर अभी तक ‘एंटी नेशनल’ की कोई परिभाषा नहीं है बल्कि यह एक मनगढ़ंत टिप्पणी भर है। वैसे क़ानून में भी देशद्रो का ज़िक्र नहीं है। अंग्रेज़ों ने अपने ख़िलाफ़ बोलने वालों को राजद्रोही क़रार दिया था।

आईपीसी की जिस धारा 124 (ए) के तहत किसी को ‘‘राजद्रोही’ घोषित करने की कवायद चल रही है उस क़ानून को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1958 में ही असंवैघानिक घोषित कर दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को बरक़रार रखा और सैकड़ों फैसले दिए। यहाँ तक कि खालिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाने को भी उसने राजद्रोह नहीं माना। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि जब तक कोई ऐक्शन नहीं होता तबतक इस क़ानून के इस्तेमाल का कोई अर्थ नहीं है। यह क़ानून अंग्रेज़ों ने भारतीय की आवाज़ बंद करने के लिए बनाया था। विडंबना ये है कि एक लोकतांत्रिक देश में इस क़ानून का इस्तेमाल जारी है।

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