बेटों का मोह छोड़ रहे भारतीय, बेटियों की स्वीकार्यता बढ़ी: IIPS रिपोर्ट

by M. Nuruddin 1 year ago Views 1337

Acceptance for daughters growing in india: IIPS re
भारतीय समाज में लंबे समय से चला आ रहा ‘बेटे-बेटियों में फर्क’ अब समाज से मिट रहा है। एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन दशकों में ऐसे परिवारों की तादाद बढ़ी है जिन्होंने बेटी के जन्म के बाद ही परिवार नियोजन अपना लिया। इससे मालूम पड़ता है कि समाज में लैंगिक भेदभाव के खिलाफ जागरूकता बढ़ रही है। यही वजह है कि अब लोग बेटों का मोह छोड़ सिर्फ बेटी के पैदा होने के बाद ही नसबंदी कराने में बिल्कुल नहीं झिझक रहे हैं।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक़ जहां 1992-93 में 16 फीसदी जोड़ों ने दो बेटियों के बाद नसबंदी कराया था, वहीं साल 2015-16 में ये आंकड़ा लगभग दोगुना 33.6 फीसदी हो गया। इसके अलावा तीन बेटियों वाले जोड़ों में भी सुधार हुआ है और इसका भी अनुपात 20 फीसदी से बढ़कर 34 फीसदी हो गया।


इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज़ की रिपोर्ट बताती है कि आज भी परिवार में बेटों की पसंद बरक़रार है। लेकिन सबसे ज़्यादा बेटों की चाहत वाले पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र जेसे राज्यों में भी अब यह मानसिकता ख़त्म हो रही है। शोधकर्ताओं का मानना है कि विवाहित जोड़ों में सिर्फ बेटियों की पसंद में बढ़ोत्तरी हुई है। शोधकर्ता बताते हैं कि सिर्फ बेटियों के जन्म के बाद परिवार नियोजन अपनाने से बेटियों के ख़िलाफ घरेलू हिंसा में भी कमी आई है।

नई स्वास्थ्य रिपोर्ट के मुताबिक़ पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र तीन ऐसे राज्य हैं जहां बेटों को ज़्यादा प्राथमिकता दी जाती है। जबकि केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बेटे कम और बेटियां ज्यादा पसंद की जाती हैं।

सर्वे से पता चलता है कि एक बच्चे, ख़ासतौर पर एक बेटी के बाद ही नसबंदी कराने वाले विवाहित जोड़ों की तादाद पंजाब में 1.5 फीसदी से बढ़कर 3.1 फीसदी हो गई है। जबकि हरियाणा में 0.7 फीसदी से 5.1 फीसदी और महाराष्ट्र में 5.4 फीसदी से बढ़कर 10.3 फीसदी पर पहुंच गया है।

इसी तरह दो बच्चों ख़ासतौर पर दो बेटियों के बाद नसबंदी कराने वाले जोड़ों की तादाद पंजाब में 4.7 फीसदी से बढ़कर 7.9 फीसदी पर पहुंच गई है। वहीं हरियाणा में 2.9 फीसदी से बढ़कर 9.9 फीसदी और महाराष्ट्र में 25 फीसदी से 36 फीसदी हो गया है। सर्वे के मुताबिक़ ऐसे जोड़े जो या तो नसबंदी करा चुके हैं या सिर्फ एक बेटी के बाद ही परिवार नियोजन चाहते हैं, तादाद बढ़ी है।

बेटों की उच्च प्राथमिकता देने वाले राज्यों पंजाब में यह आठ फीसदी, हरियाणा में 20 फीसदी और महाराष्ट्र में 10 फीसदी तक बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक़ पंजाब में एक बेटी के बाद ही नसबंदी या ज़्यादा बच्चे नहीं चाहने वाले जोड़ों की तादाद 21 फीसदी है। आसान भाषा में कहें तो भारत में बेटियों की स्वीकार्यता बढ़ी है और लैंगिक भेदभाव समाज में धीरे ही सही लेकिन मिट रहा है।

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