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136 साल की काँग्रेस : एक बार फिर शून्य से शिखर पर जाने की चुनौती!

by Rahul Gautam 4 months ago Views 1790

136 year old Congress: Once again the challenge of
भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी इतिहास के सबसे मुश्किल दौर से गुज़र रही है। घटता जनाधार, करिश्माई नेतृत्व की कमी, भीतरी गुटबाज़ी, विचारधारा को लेकर असमंजस, एक राजनीतिक दल में जितनी समस्या हो सकती है, वह सभी इस वक़्त कांग्रेस में मौजूद है। 2014 में 44 लोकसभा सीटों वाली ऐतिहासिक हार का मुँह देखने वाली पार्टी को 5 साल इन्हीं सब समस्या के चलते 2019 में एक और लज्जित हार का सामना करना पड़ा।

एक  नज़र डालते है की कांग्रेस अबतक के सफर पर।


1885 में ब्रिटिश ए.ओ. ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना स्वतंत्रता संग्राम की गति को रोकने के लिए की थी। 1857 की क्रांति से दहले अंग्रेजों ने एक सेफ्टी वाल्व की ज़रूरत महसूस की थी।इस क्रांति ने ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन ख़त्म करके भारत को सीधे इंग्लैंड की महारानी के शासन के अधीन कर दिया था। ऐसे में महारानी की प्रजा को प्रार्थनापत्र देकर समस्याओं को उठाने के लिए एक मंच की आवश्यकता थी। शुरुआत में कांग्रेस की यही भूमिका थी। लेकिन जल्दी् ही  महात्मा गांधी के नेतृत्व में जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस जैसे जननायकों ने इसे आज़ादी की लड़ाई का सबसे बड़ा मंच बना दिया।

नतीजा ये हुआ कि आज़ादी के वक्त कांग्रेस के सामने कोई गंभीर राजनीतिक चुनौती नहीं थी। जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस ही नहीं, सारे देश के नेता थे। कांग्रेस के 'समाजवादी समाज' बनानने के संकल्प ने देश की जनता पर जादू किया। साथ ही स्वतंत्रता संघर्ष के ताप का असर भी था। तीस साल तक कांग्रेस लगातार दिल्ली पर केंद्र सरकार चलाती रही।

नेहरू के बाद शास्री जी के अल्प शासन के बाद बागडोर इंदिरा गाँधी के पास आयी और उन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण, राजा महाराजाओं का प्रीवी पर्स खत्म करेक और 1971 में पाकिस्तान पर विजय और बांग्लादेश का निर्माण कराके महान नेता का तमगा हासिल कर लिया। यह जादू 1975 में इमरजेंसी विरोधी आंदोलन से टूटा और 1977 में पहली बार केंद्र की सत्ता से वह बाहर हुई। यह अलग बात है कि जनता पार्टी की सरकार ढाई साल ही चल पायी और इंदिरा गाँधी ज़्यादा लोकप्रियता के साथ सत्ता में वापस आयीं। 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने कमान संभाली और चुनाव में ऐतिहासिक बहुमत प्राप्त किया। लेकिन वी.पी.सिंह के नेतृत्व में चले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने मि.क्लीन की उनकी छवि को दागदार बनाया और 1989 में उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ा।

कहते हैं कि राजीव के दौर में ही पार्टी ने विचारधारा के मौके पर समझौतावादी रुख अख्तियार किया और संगठन का महत्व कम होने लगा।वैसे इंदिरा गाँधी के समय ही कांग्रेस संगठन नाम से पार्टी का एक हिस्सा अलग हुआ था, जिसका बाद में जनता पार्टी में विलय हो गया था। तब इंदिरा ही एकछत्र नेता थीं और राजीव के समय भी वही एकमात्र केंद्र बनते गये।1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलने और रामजन्म भूमि के शिलान्यास ने अल्पसंख्यकों को कांग्रेस के प्रति संदेह से भर दिया। उधर, बीएसपी के उत्थान ने कांग्रेस के दलित जनाधार में भी बड़ी सेंध लग गयी। नियति ने राजीव गाँधी को मौका भी नहीं दिया और 1991 में लिट्टे के आतंकियों ने उनकी हत्या कर दी।

राजीव गाँधी की शहादत के बाद नरसिम्हाराव के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब हुई और उदारीकरण का दौर शुरू हुआ। इस दौर के साथ कांग्रेस के तमाम समाजवादी संकल्प पीछे हो गये और पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे गिरने लगा। 1992 में बाबरी मस्जिद तोड़े जाने से तो पार्टी सीधे अल्पसंख्यकों के निशाने पर आ गयी जो कभी उसका सबसे विश्वस्त आधार थे। उन्होंने मुलायम सिंह यादव से लेकर लालू यादव तक तमाम क्षेत्रीय क्षत्रपों को पहली पसंद बना लिया। गाँधी परिवार के राजनीति से हट जाने के बाद पार्टी का कोई दूसरा स्वीकृत केंद्र नहीं बन सका। जबरदस्त गुटबाजी के कारण पार्टी टूट भी गयी। ऐसे में संगठन की लंबी तैयारी से लैस बीजेपी को मौका मिल गया जिसने राममंदिर आंदोलन के जरिये बड़ा जनाधार विकसित कर लिया था। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी एनडीए बनाकर केंद्र में सत्तारूढ़ होने में कामयाब हो गयी।

1997 में पार्टी की खिसकती सियासी ज़मीन को बचाने के लिए एक बार फिर पार्टी के तमाम नेता नेहरू-गांधी परिवार की शरण में गये और 1997 में सोनिया गांधी ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। 1999 में वह पार्टी की अध्यक्ष बनीं और काफ़ी हद तक पार्टी को उन्होंने न सिर्फ सिमटने से बचाया बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसी शख्सियत को हराकर 2004 में पार्टी को केंद्र की सत्ता वापस दिलाने का चमत्कार करके भी दिखा दिया। यही नहीं, उन्होंने प्रधानमंत्री बनना भी स्वीकार नहीं किया जिससे उनकी छवि त्याग करने वाले नेता की बनी। पीएम के रूप में मनमोहन सिंह की तमाम उपलब्धियाँ रहीं और पार्टी 2019 में भी जीत हासिल करने में कामयाब रही पर राजनीतिक मामलों में आमतौर से उनकी दूरी ने शीर्ष पर एक खाली स्थान पैदा कर दिया। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चले अन्ना आंदोलन ने पार्टी की छवि काफ़ी ख़राब कर दी और गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर नरेंद्र मोदी के ज़रिये उस खाली स्थान को भरने में जुट गयी।

2014 के चुनाव में कांग्रेस को इतिहास का सबसे तगड़ा झटका लगा। पार्टी 206 लोकसभा सीटों से 44 पर सिमट गई। ए.के एंटोनी ने रिपोर्ट में कहा गया पार्टी की छवि हिंदू-विरोधी और मुस्लिमपरस्त हो गई जिसकी वजह से पार्टी की यह दुर्दशा हुई। पार्टी ने साफ्ट हिंदुत्व का दाँव आज़माया लेकिन कोई खास फायदा नहीं हुआ। 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले राहुल को पार्टी की कमान दी गई। उन्होंने आक्रामक अभियान भी चलाया लेकिन पार्टी को खास कामयाबी हासिल नहीं हुई। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में जिस तरह संसाधान और संगठन के दम पर बीजेपी ने चुनावी कामयाबी हासिल की उसका मुकाबला करने का कोई तरीका पार्टी खोज नहीं पायी। 2019 में एक और शर्मनाक हार के बाद राहुल गाँधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस को फिर सोनिया गांधी की ही शरण में जाना पड़ा।

अब समस्या यह है की बढ़ती उम्र के कारण सोनिया गांधी रिटायरमेंट चाहती हैं और राहुल गाँधी दोबारा अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं है। उधर पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं है जिसकी अखिल भारतीय स्वीकृत हो। राहुल से नज़र हटती है तो नाम प्रियंका गाँधी का आता है पर वो मिशन यूपी पर ही पूरी तरह केंद्रित लगती हैं। कई राजनीतिक प्रेक्षक कांग्रेस को भंग करने या गाँधी परिवार से मुक्त होने का नुस्खा पेश करते हैं लेकिन इससे रही-सही उम्मीद भी खत्म हो सकती है। अभी भी वोट शेयर के लिहाज से बीजेपी के बाद सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ही है और उसका अखिल भारतीय स्वरूप भी है। सवाल उस जुनून और विचारधारा का है जो किसी पार्टी को शून्य से शिखर तक पहुँचाती है। जो पार्टी अंग्रेज़ों से जीत का असंभव सपना सच साबित कर चुकी है वह फिर से खड़ी हो सकती है, बशर्ते वह अपना खोया जुनून और वैचारिक धार वापस पा सके। साथ ही गाँव-गाँव मज़बूत संगठन खड़ा कर सके जो कभी उसकी वास्तविक ताकत थी।

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