बजट सत्र के ख़त्म होने तक नहीं बढ़ेगी तेल की कीमतें !

by GoNews Desk Edited by M. Nuruddin 2 years ago Views 9470

वैश्विक बाज़ार में दैनिक आधार पर तेल की कीमत निर्धारित होती है, दुनिया में तेल के सबसे बड़े उत्पादक अमेरिका में, कीमतें 40 फीसदी बढ़ गई है...

Oil prices will not increase till the end of the b
वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी की सुगबुगाहट से भी देश में ईंधन की कीमतें बढ़ जाती है। यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद से वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 35 फीसदी तक बढ़ गई है लेकिन देश में तेल की कीमत अपने उच्च कीमत पर सामान्य बनी हुई है।

भारत में कथित रूप से पांच राज्यों में चुनाव की वजह से पिछले चार महीने से तेल के दाम नहीं बढ़े हैं। जो लोग इससे प्रभावित होते हैं, वे अपनी सांसें थाम कर बैठे हैं कि कभी भी तेल के दाम आसमान छू सकते हैं।


वैश्विक बाज़ार में दैनिक आधार पर तेल की कीमत निर्धारित होती है, दुनिया में तेल के सबसे बड़े उत्पादक अमेरिका में, कीमतें 40 फीसदी बढ़ गई है। इसके बाद स्टैंड-अप कमेडियन मज़ाक बना रहे हैं और कह रहें है कि वे अपने परिवार के साथ ईंधन स्टेशन जैसी महंगी जगहों का दौरा कर रहे हैं।

रूस दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है और अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिबंधों की वजह से वो अपना तेल नहीं बेच पा रहा है। भारत में कीमतें वैश्विक मूल्य निर्धारण से ही जुड़ी है, लेकिन 90 फीसदी आपूर्ति सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के हाथों में है। इसका मतलब है कि सरकार अभी भी कीमत को नियंत्रित कर सकती है, इसलिए कीमतों में बढ़ोत्तरी अपरिहार्य है।

सबसे पहले हम यह देखते हैं कि, भारत तेल उत्पादन और खपत में कहा खड़ा है। एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में, भारत को लोगों की बढ़ती गतिशीलता को पूरा करने के लिए और ज़्यादा जीवाश्म ईंधन की ज़रूरत है। अगर अच्छी तनख़्वाह होगी तो वे कार की खरीदारी करेंगे और उसे चलाने के लिए तेल की ज़रूरत होती है जो खपत को बढ़ाता है।

पिछले सात सालों में, तेल आयात 210.7 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर 2019-20 तक 270.7 मिलियन टन हो गया है।

चूंकि लॉकडाउन के दरमियान अधिकांश निजी वाहनों पर ताला लग गया था जिससे तेल की खपत भी कम हुई और यह वजह रही है कि आयात 2020-21 में घटकर 239.7 मिलियन टन रह गया। लेकिन महामारी से पहले औसतन भारत की तेल की ज़रूरत प्रति वर्ष लगभग 10 फीसदी बढ़ गई।

आश्चर्यजनक बात यह है कि इसके बावजूद भारत का तेल उत्पादन बढ़ा नहीं है जिसका कंट्रोल सरकार के हाथों में ही है। भले ही केन्द्र सरकार ने 2015 में बड़े धूमधाम से “आत्मनिर्भर भारत” अभियान की शुरुआत की लेकिन सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों ने अपनी तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा आयात किया।

भारत का तेल का उत्पादन 2014-15 में 37.4 मिलियन टन से घटकर 2020-21 में 30.5 मिलियन टन हो गया, जो 20 फीसदी से ज़्यादा की गिरावट है।

आयात और उत्पादन में इस अंतर की वजह से ही देश का व्यापार घाटा बढ़ रहा है। व्यापार बिल में 50 फीसदी हिस्सा तेल आयात का ही होता है। पिछले आठ सालों के दरमियान देखा गया है कि भारत तेल की आपूर्ति को लेकर मिडिल-ईस्ट की तुलना में अब अमेरिका पर ज़्यादा निर्भर हो रहा है।

अब जबकि कीमतों में वैश्विक बढ़ोत्तरी और व्यापार घाटा सरकार के सामने है, घरेलू बाज़ार में सरकार के लिए कीमतों को बढ़ाना मुश्किल हो गया है। संसद का बजट सत्र भी चल रहा है और बजट आवंटन पर भी चर्चा जारी है।

1 फरवरी को बजट पेश करने के बाद सरकार पहले ही 1.4 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी की मांग कर चुकी है। अगर वो सत्र के दौरान ईंधन की कीमत बढ़ाती है, तो इसे विपक्ष के आक्रामक हमलों का सामना करना पड़ेगा। फरवरी महीने में थोक महंगाई दर भी 13.1 फीसदी पर पहुंच गई है, जिससे सरकार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ सकता है।

ऐसे में सरकार नहीं चाहती कि तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी की जाए और विपक्ष के विरोध का सामना किया जाए। इनके अलावा, इसके राजस्व और व्यय के प्रस्तावों को पुनर्गणना करना होगा जो अभी भी संसद में चर्चा के अधीन हैं।

सरकार अपने आलोचकों से कहती रही है कि देश में तेल की कीमत वैश्विक बाज़ार में कीमत बढ़ने के बाद तय होती है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। सरकार अगर चाहे तो देश में तेल की कीमत नहीं बढ़ेगी लेकिन माना जा रहा है कि सरकार उपभोक्ता पर एक ही साथ कीमत बढ़ाकर दबाव बढ़ा दे। 8 अप्रैल को संसद का बजट सत्र ख़त्म होगा, शायद तब तक हम सभी को इंतजार करना होगा।

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