‘कोई सबूत नहीं’: विकास दुबे एनकाउंटर में यूपी पुलिस को क्लीन चिट

by Sarfaroshi 2 years ago Views 2712

vikas dubey encounter

साल 2020 के चर्चित विकास दुबे एनकाउंटर में बनाई गई जांच समीति ने यूपी पुलिस को क्लीन चिट दे दी है। समीति का कहना है कि जांच में पाए गए सबूत पुलिस की एनकाउंटर को ले कर बयान की गई कहानी का समर्थन करते हैं। समीति ने ये भी कहा कि जांच के दौरान यूपी पुलिस के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिले हैं।

कानपुर के नामी बदमाश विकास दुबे के एनकाउंटर मामले में जांच की रिपोर्ट संसदीय मामलों के मंत्री सुरेश खन्ना ने गुरूवार को यूपी विधानसभा में पेश की। रिटायर्ड जज बीएस चौहान की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय जांच आयोग ने करीब एक साल जांच करने के बाद 800 पेजों की रिपोर्ट तैयार की जिसके अंत में कहा गया है कि मामले में यूपी पुलिस के खिलाफ कोई सबूत नहीं पाया गया है।

समीति ने हालांकि यूपी पुलिस को निर्दोष घोषित करते हुए स्थानीय पुलिस पर सवाल उठा दिए हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि विकास दुबे और उसके साथियों को स्थानीय पुलिस, राजस्व और प्रशासनिक अधिकारियों से संरक्षण प्राप्त था और ‘दोषयुक्त सरकारी नौकरों’ के खिलाफ जांच की सिफारिश की गई है। 

बता दें कि साल 2020 में कानपुर के हिस्ट्री शीटर विकास दुबे और उसके साथियों ने मुठभेड़ में 8 पुलिस जवानों को मार दिया था। दरअसल कानपुर पुलिस बीकरू गांव में विकास दूबे पर छापेमारी करने पहुंची थी।

इस दौरान बदमाश ने टीम पर घात लगाकर हमला कर दिया जिसमें आठ पुलिस जवानों की मौत हो गई। करीब एक हफ्ते तक फरार रहने के बाद विकास दूबे को मध्य प्रदेश से हिरासत में लिया गया और उसे वापस लाने के दौरान वह कार जिसमें गैंगस्टर को लाया जा रहा था, वह हाइवे पर पलट गई। पुलिस ने दावा किया कि गाड़ी पलटने के बाद दुबे ने भागने की कोशिश की जिसमें उसका एनकाउंटर कर दिया गया। 

इस पूरे मामले की जांच के लिए बनाई गई समीति ने पुलिस की कहानी का समर्थन किया है। उसने अपनी रिपोर्ट में समीति में मौजूद डॉक्टर के हवाले से लिखा है कि डॉ आरएस मिश्रा, जो डॉक्टरों के पैनल में थे, उन्होंने पोस्टमार्टम किया और स्पष्ट किया कि दूबे को लगी चोटें पुलिस के की कहानी के अनुसार हो सकती हैं।  

समीति ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि पुलिस की एनकाउंटर को लेकर बताई कहानी के खिलाफ कोई सबूत जमा नहीं किए गए और न ही उसका विरोध किया गया। ऐसे में पुलिस की कहानी पर यकीन न करने का सवाल नहीं उठता है।

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