क्या महामारी में आधिकारिक आंकड़ों से ज़्यादा मौतें हुई ? LIC डेटा पर एक नज़र

by GoNews Desk 2 years ago Views 1722

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अगर आप भारत में कोरोना महामारी से हुई मौतों का सही आंकलन करना चाहते हैं तो तक आपको एलआईसी- लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा सेबी- सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड को IPO के लिए दायर किए गए रेड हेरिंग प्रोसपेक्टस को ध्यान से समझना होगाा।  

भारत की सबसे बड़ी बीमा कंपनी के इक्विटी स्टॉक का पांच फीसदी हिस्सा सरकार ने जनता को देने का फैसला किया है यानि केन्द्र इसे मार्केट में लिस्ट करने जा रहा है। कंपनी की लिस्टिंग देश के अबतक के सबसे बड़े आईपीओ के रुप में हुई है। सेबी को दिए गए आंकड़ों के मुताबिक़ कंपनी का मार्केट कैप 5.4 लाख करोड़ रूपये बताया गया है। 


कंपनी द्वारा महामारी के दौरान/बाद इंश्योरेंस क्लेम से पता चलता है कि देश में भारी संख्या में मौतें दर्ज की गई है। साल 2018-19 के दौरान एलआईसी को 7.5 लाख से ज़्यादा डेथ क्लेम प्राप्त हुए और कंपनी ने इन दावों के रूप में 17,128 करोड़ रूपये का भुगतान किया।

इसके अगले ही साल मार्च 2020 तक महामारी से ठीक पहले कंपनी को लगभग समान 7.58 लाख क्लेम प्राप्त हुए और कंपनी ने इसके लिए 17,527 करोड़ रूपये का भुगतान किया। इसके बाद वित्त वर्ष 2020-21 में डेथ क्लेम 25 फीसदी बढ़कर 9.46 लाख हो गए और कंपनी ने इसके लिए 23,926 करोड़ रूपये का भुगतान कर इन दावों का निपटारा किया।

हालांकि 2021 के पहले छह महीने का ही डेटा मौजूद है। सितंबर 2021 तक सिर्फ शुरुआती छह महीने में डेथ क्लेम 7.93 लाख रही और कंपनी ने इसके लिए 21,734 करोड़ रूपये का भुगतान किया जो कि उससे पहले एक साल में किए गए भुगतान का 92 फीसदी है।

सरकार ने दावा किया है कि पिछले दो सालों में कोविड-19 से पांच लाख लोगों की मौत हुई है लेकिन लाइफ इंश्योरेंस डेटा से पता चलता है जिसकी पहुंच सिर्फ 3.2 फीसदी आबादी तक है, देश में सरकार के दावों के उलट कहीं ज़्यादा मौतें हो सकती है। इनमें भी कंपनी ने सिर्फ शुरुआती छह महीने का ही डेटा दिया है, जबकि अगर कुल आंकड़ों का अनुमान लगाया जाए तो यह और भी ज़्यादा हो सकता है। 

महामारी से एलआईसी को एक और झटका उसके एजेंट के कामकाज में बाधा आने से लगा है जो पॉलिसीज़ बेचते हैं। आंकड़ों के मुताबिक़ जहां 2019 में कंपनी ने 75 मिलियन पॉलिसी बेचे वो घटकर 2021 में 52 मिलियन रह गया है। 

लेकिन कंपनी के लिए असली झटका वित्त वर्ष 22 की पहली छमाही में आया जहां पहले छह महीनों में सिर्फ 19 मिलियन पॉलिसी ही जारी की जा सकीं।

पहली बार महत्वपूर्ण रूप से, जारी किए गए व्यक्तिगत पॉलिसी नंबर महामारी के पहले वर्ष के दौरान लगभग 21 मीटर से घटकर 7 मीटर रह गए। इससे पता चलता है कि जीवन बीमा की मांग गिर गई क्योंकि लोग महामारी की दूसरी लहर से आर्थिक रूप से प्रभावित हुए।

इन प्रवृत्तियों से यह भी पता चलता है कि एलआईसी का आईपीओ ख़राब समय पर हो सकता है जब कंपनी की वित्तीय संख्या बहुत स्वस्थ नहीं है और व्यवसाय म़जबूत नहीं है। शायद यही वजह है कि कर्मचारी और ट्रेड यूनियन भी कंपनी की लिस्टिंग से सावधान हैं और आईपीओ के कदम का विरोध कर रहे हैं।

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