शरद यादव की बेटी को कांग्रेस का टिकट: क्या वंशवाद की बात बेमतलब हुई?

by GoNews Desk 3 years ago Views 2755

Congress ticket to Sharad Yadav's daughter: did dy
प्रमुख समाजवादी नेता और कभी वंशवादी राजनीति के कट्टर विरोधी रहे शरद यादव की बेटी सुभाषिनी राज राव अब कांग्रेस में शामिल होकर बिहार के उसी मधेपुरा के बिहारीगंज विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगी जहाँ से उनके पिता पिछला लोकसभा चुनाव हार गये थे। अपने दिग्गज विरोधी की बेटी को खुले मन से स्वागत करते हुए कांग्रेस ने  सुभाषिनी को टिकट देने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई।

सुभाषिनी की एकमात्र योग्यता यही है कि वे एक ऐसे पिता की संतान हैं जो सात बार लोकसभा और तीन बार राज्यसभा में रहा। केंद्रीय मंत्री के साथ-साथ एनडीए का  संयोजक भी रहा। शरद यादव फिलहाल बीमार हैं तो कमान बेटी के हाथ है।


वंशवाद और क्या होता है? बग़ैर किसी संघर्ष किसी की संतान होने की वजह से सीधे वहाँ पहुँचना जहाँ जाने के लिए लोग बरसों एड़ियाँ घिसते हैं। सुभाषिनी को भी यही अवसर मिला है। विडंबना बस इतनी है कि वे शरद यादव की बेटी है जो कभी 'वंशवादी राजनीति' को उखाड़ फेंकने की क़समें खाते थे।

शरद यादव की राजनीतिक यात्रा किसी पिता की मेहरबानी से नहीं शुरू हुई। 1974 में  जबलपुर में हुए एक उपचुनाव के लिए उनका चुनाव सीधे जयप्रकाश नारायण ने किया था। वे ताक़तवर इंदिरा कांग्रेस के विरुद्ध पल-बढ़ रहे असंतोष का  प्रतीक बने और इंजीनियरिंग कॉलेज से सीधे लोकसभा पहुँच गये। आज़ादी के दिन से ठीक डेढ़ महीने पहले पैदा हुए शरद यादव ने फिर मुड़कर नहीं देखा। उनकी भाषा और भंगिमा समाजवाद और सामाजिक न्याय के मुखर पुरोधा की रही।

लेकिन पहले 'सांप्रदायिक' बीजेपी का साथ और अब बेटी को कांग्रेस के ज़रिये विधानसभा पहुँचाने की उनकी कोशिश बताती है कि समाजवाद और सामाजिक न्याय के नाम पर होने वाली राजनीति का एक चुक्र पूरा हो चला है जिसमें पुराने नारों और संकल्पों की गूँज भी नहीं सुनायी पड़ती।

वैसे यह सिलसिला बहुत पहले शुरू हो गया था। लालू यादव ने जब जेल जाने की स्थिति में राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवाया था तो यह भी उसी संपूर्ण क्रांति की धारा से निकली एक महान संभावना का पतन था। तब जनता दल में तमाम लोग थे जो लालू की जगह ले सकते थे, लेकिन लालू ने  ऐसा 'मास्टरस्ट्रोक' चला कि मुख्यमंत्री की कुर्सी से लेकर आवास तक पर क़ब्ज़ा बरक़रार रहा। तमाम दिग्गजों को दरकिनार करते हुए अगर तेजस्वी यादव के हाथ में आरजेडी की कमान है तो यह उसी लालू नीति का विस्तार कहा जा सकता है।

बिहार चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर लव सिन्हा की भी इंट्री हुई है जो शत्रुघ्न सिन्हा के बटे और फ़िल्म अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा के भाई हैं।  शत्रुघ्न सिन्हा पिछला लोकसभा चुनाव कांग्रेस से लड़े थे और उनकी पत्नी समाजवादी पार्टी से। परिजनों का लोकसभा विधानसभा पहुँचना ज़्यादा ज़रूरी है न कि पार्टी का झंडा या विचारधारा।   ऐसे न जाने कितने दूसरे नेता पुत्र, पुत्रियाँ, भतीजे, बहुएँ राजनीति के बग़ीचे के फूल और काँटे बने हुए हैं।

हक़ीक़त ये है कि जनता को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। कहीं न कहीं उत्तराधिकारी का मध्ययुगीन या प्राचीन विचार उसके मन में भरा हुआ है। नेताओं के बेटों का नेता होना उसे स्वाभाविक लगता है।

1934 में काँग्रेस के अंदर ही समाजवादी दल का निर्माण करने वालों ने सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, वैचारिक रूप से भी देश को आज़ाद कराने का सपना देखा था। 1948 में कांग्रेस के बाहर आकर उन्होंने मुख्य विपक्ष बनने की कोशिश में लगातार कांग्रेस को निशाने पर रखा। लाल बहादुर शास्त्री के बाद गूँगी गुड़िया इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने को उन्होंने नेहरू जी का ही प्रताप माना। इंदिरा के समय संजय गाँधी का उदय तो इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण बना और राजीव गाँधी की ताजपोशी के पीछे भी वंशवादी विचार की अहम भूमिका रही।

समाजवादी लागातार इन प्रश्नों को उठाते रहे थे, लेकिन ज़्यादार बड़े नेताओं का जोश जवानी के साथ ही चला गया। एक ज़मान के दिग्गज समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव ने यूपी में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपने बेटे को बैठाया जब समाजवादी पार्टी को पहली बार पूर्ण बहुमत मिला।

तो क्या मान लिया जाये कि वंशवाद अब एक ऐसा फिनोमिना है जिस पर हो हल्ला मचाने का कोई मतलब नहीं है। न पार्टियाँ इस पर कान देती हैं और न जनता। और सवाल ये भी है कि 31 साल से लगातार पीएम की कुर्सी से  दूर गाँधी परिवार का कोई सदस्य अगर लगातार विपक्षी नेता बतौर संघर्ष करते हुए कभी उस पद पर पहुँचते हैं तो उसे वंशवाद कहा जाये या नहीं?

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