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कोरोना काल में विदेशों में नौकरी गंवा रहे हैं भारतीय, अरबों डॉलर के नुक़सान की आशंका

by Rahul Gautam 3 months ago Views 16748

Indians are losing jobs abroad during Corona perio
कोरोनावायरस और लॉकडाउन के चलते दुनियाभर में आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। भारत पर इसकी दोहरी मार पड़ रही है। एक तरफ़ देश में बेरोजगारी बढ़ रही है तो दूसरी तरफ़ विदेशों में काम करके भारतीय अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने में योगदान देने वाले भी बेरोज़गार होकर वापस आ रहे हैं।

Department of Non-Resident Keralites Affairs के मुताबिक बीती साल मई से लेकर इस साल 4 जनवरी तक 8.43 लाख लोग विदेश से केरल लौटे हैं। इनमे 5.52 लाख लोगो ने केरल वापस आने की वजह विदेश में रोज़गार छिन जाना बताया है। पिछले 30 दिनों में ही 1.40 लाख लोग वापस लौटे हैं। देश में पहले ही अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर से गुजर रही है, ऐसे में बाहर बसे भारतीयों के लौटे से उसे कैसे झटका लगेगा, इससे आँकड़ों से समझिये।


लोकसभा में जारी आंकड़ों से पता चलता है कि रोज़गार और घर परिवार चलाने के लिए एक करोड़ 36 लाख भारतीय विदेशों में बस गये हैं। अकेले, सात इस्लामिक देशों यानी यूनाइटेडट अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, ओमान, क़तर, बहरीन और मलेशिया में 83 लाख 72 हज़ार 333 भारतीय रह रहे हैं, जबकि अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, नेपाल, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा में 30 लाख 410 भारतीय हैं।

साल 2019 में इन भारतीयों ने 83 बिलियन डॉलर भारत भेजकर देश की अर्थव्यवस्था मजबूत की थी। आरबीआई के 2017 के सर्वे से पता चलता है कि सबसे ज्यादा  26.9 फीसदी रक़म यूनाइटेड अरब अमीरात से आती है। इसके बाद अमरीका से 22.9 फीसदी, सऊदी अरब से 11.6 फीसदी, क़तर से 6.5, कुवैत से 5.5 फीसदी और ओमान से 3 फीसदी रक़म भारत भेजी जाती है। इस तरह विदेश में बसे भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले कुल पैसे का लगभग 75 फीसदी इन्हीं देशो से आता है। अगर अमेरिका को छोड़ दे तो इस आंकड़े में दर्ज बाक़ी मुल्क़ पूरी तरह कच्चे तेल के उत्पादन पर निर्भर हैं।

कोरोना से थमी आर्थिक रफ़्तार के चलते दुनिया में तेल की मांग कम हुई है जिससे कच्चे तेल की कीमतें पाताल पहुँच गयी हैं। ज़ाहिर है दौर आर्थिक मंदी का है तो विदेशी कामगारों की संख्या घटाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। मसलन अमीर देश कुवैत अपने यहां काम करने वाले प्रवासी कामगारों की तादाद 50 फीसदी तक घटाने का प्रयास कर रहा है। 48 लाख की आबादी वाले कुवैत में करीब 34 लाख लोग प्रवासी कामगार हैं और इसमें 15 लाख भारतीय हैं।

पिछले महीने ही कुवैती सरकार ने फैसला किया था शिक्षा मंत्रालय में काम करने वाले प्रवासी कर्मचारियों को नौकरी से निकालकर उनकी जगह कुवैती नागरिकों को काम पर रखा जायेगा। कुवैत 60 साल से ज़्यादा उम्र के 68,000 विदेशी कर्मचारियों के लिए वर्क परमिट जनवरी 2021 में रिन्यू करने से पहले ही मना कर चुका है। इसकी गाज जिन पर गिर है उनमें काफी संख्या में भारतीय हैं।

जानकारों की मानें तो अन्य खाड़ी देश भी कुवैत की तरह तेल पर ही निर्भर हैं और पूरी आशंका है कि वो भी कुवैत की राह पर चल पड़ें। ऐसा होता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगेगा जो ‘कंगाली में आटा गीला’ वाली बात होगी। विश्व बैंक पहले ही आशंका जता चुका है की देश में बाहर से आने वाले पैसे में इस वर्ष  23% की गिरावट आ सकती है और यह आँकड़ा 83 अरब डॉलर से 23% घटकर 64 अरब डॉलर रह सकता है।

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