पीएम मोदी के डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देती नीतीश सरकार, ढाई करोड़ स्टूडेंट्स में 42 को बांटे स्मार्टफोन

by GoNews Desk 9 months ago Views 1067

PM modi's digital india campaign

देश में डिजिटल इंडिया की पहल शुरु हुए छह साल बीत चुके हैं लेकिन देश का ग्रामीण इलाक़ा अब भी “हाईस्पीड इंटरनेट केक्टिविटी” ही नहीं बल्कि पर्याप्त इंटरनेट कनेक्टिविटी से भी दूर है। लगभग स्कूल बंद हैं और ऐसे में यहां रह रहे छात्र-छात्राओं की ऑनलाइन पढ़ाई नहीं हो पा रही है। केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि देश के असम, आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में 40-70 फीसदी छात्रों के पास डिजिटल एक्सेस (इंटरनेट की सुविधा) नहीं है।

शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि मध्य प्रदेश में 70 फीसदी जबकि “मॉडल राज्य” गुजरात में 40 फीसदी छात्र-छात्रा बिना इंटरनेट के हैं। महामारी के दौरान बंद किए गए स्कूल, कई राज्यों में अबतक नहीं खोले गए हैं। इस वजह से स्टूडेंट्स स्कूल की पढ़ाई से लेकर ट्युशन की पढ़ाई तक ऑनलाइन ही कर रहे हैं। ऐसे में एक तिहाई छात्र-छात्राओं के पास डिजिटल कनेक्टिविटी या इंटरनेट की कनेक्टिविटी न होना भारतीय शिक्षा ढांचे के एक और नकारात्मक पहलु को दिखाता है।

रिपोर्ट बताती है कि मध्य प्रदेश में 70 फीसदी, बिहार में 58.09 फीसदी, आंध्र प्रदेश में 57 फीसदी, असम में 44.24 फीसदी, झारखंड में 43.42 फीसदी, उत्तराखंड में 41.17 फीसदी और गुजरात में 40 फीसदी स्टू़डेंट्स के पास डिजिटल एक्सस नहीं है। जबकि इसके अलावा समृद्ध माने जाने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों जैसे दिल्ली में लगभग 96%, केरल में  98.37% और तमिलनाडु में 85.49% छात्रों के पास इंटरनेट एक्सेस है।

आंध्र प्रदेश में 29 लाख छात्र-छात्रा से ज़्यादा को सर्वे में शामिल किया गया और इनमें सिर्फ 5,752 छात्र-छात्राओं के पास ही लैपटॉप हैं जो सर्वे में शामिल कुल स्टूडेंट्स का 0.18 फीसदी है। बिहार में कुल 2.46 करोड़ छात्रों में 1.43 करोड़ बच्चों के पास डिजिटल एक्सेस नहीं है। उत्तराखंड से सर्वे में शामिल किए गए 5.20 लाख छात्रों में 2.14 लाख छात्र-छात्राओं के पास ऑनलाइन लर्निगं के लिए डिजिटल डिवाइस की कमी है। 

यूनिसेफ का गुजरात के 12,000 स्कूलों में किया गया सर्वे बताता है कि वहां कम से कम 40 फीसदी बच्चों के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट नहीं है। झारखंड में भी 74.89 फीसदी छात्रों में 32.52 फीसदी के पास समार्टफोन नहीं है। इनके अलावा मध्य प्रदेश में शिक्षा विभाग का 98 लाख छात्रों पर किया गया सर्वे बताता है कि इनमें से 70 फीसदी छात्रों के पास स्मार्टफोन नहीं था।

शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में यूपी और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के आंकड़े नहीं है जबकि राजस्थान सरकार का दावा है कि राज्य में 100 फीसदी छात्रों को डिजिटल एक्सेस है। 

अब सवाल यह है कि सरकारों ने राज्यों में बिसरे डिजिटल डिवाइड को कम करने के लिए क्या क़दम उठाए, तो बिहार में 2.53 करोड़ छात्र-छात्राओं पर 42 को स्मार्टफोन बांटे गए हैं और 250 स्कूलों को सरकार टैबलेट देने की योजना बना रही है। असम सरकार ने अध्यापकों को छात्रों के घर जा कर उन्हें पढ़ाने और टोल फ्री नंबर लॉन्च किया है ताकि छात्र अपनी शंका दूर कर सके।

शिक्षा मंत्रालय की इस रिपोर्ट से साबित होता है कि देश के राज्यों में डिजिटल डिवाइड किस गहराई तक उतरा हुआ है। डिजिटल डिवाइड सिर्फ राज्यों के बीच नहीं बल्कि अमीर और गरीबों के बीच और पुरूषों और महिलाओं के बीच पहले से मौजूद है और महामारी के बीच यह और उभर कर सामने आया है। 

स्क्रॉल की एक रिपोर्ट के मुताबिक 20 फीसदी सबसे गरीब घरों में से सिर्फ 2.7 फीसदी के पास कंप्यूटर और 8.9 फीसदी के पास इंटरनेट है जबकि सबसे अमीर 20 फीसदी घरों में 27.6 फीसदी के पास कंप्यूटर और 50.5 फीसदी के पास इंटरनेट सुविधा है। 

इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 67 फीसदी पुरूषों के पास इंटरनेट सुविधा थी जबकि सिर्फ 33 फीसदी महिलाओं के पास इंटरनेट सुविधा थी। इसमें भी अगर क्षेत्रों के आधार पर देखा जाए तो ग्रामीण इलाकों के 72 फीसदी पुरूषों के पास और सिर्फ 28 फीसदी महिलाओं के पास इंटरनेट सुविधा है। भारत में कुल 503 मिलियन एक्टिव इंटरनेट यूजर है जबकि ग्रामीण क्षेत्र कुल इंटरनेट यूजर के मामले में शहरी क्षेत्र से आगे हैं। ग्रामीण भारत में 227 मिलियन और शहरी भारत में 207 मिलियन एक्टिव इंटरनेट यूजर हैं।   

ज़ाहिर है कि सरकार को देश में मौजूद डिजिटल डिवाइड को कम करने के लिए कदम उठाने चाहिए लेकिन इसके इतर डिजिटल ई-लर्निंग के लिए ह्यूमन रिसोर्सेज डेवेलेपमेंट बजट को साल 2020-21 में घटा कर 469 करोड़ कर दिया गया था जबकि 2019-20 में यह 604 करोड़ था।

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