अर्थव्यवस्था तो सिकुड़ी लेकिन सरकार ने भी नहीं किया बीते साल जितना ख़र्च

by Rahul Gautam 10 months ago Views 716

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक साल 2020 की पहली तिमाही में सरकार ने 7 लाख 26 हज़ार 278 करोड़ रुपए खर्च किये थे, जबकि इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही यानि जुलाई -सितंबर तिमाही में यह आँकड़ा घटकर रह गया 5 लाख 61 हज़ार 812 करोड़ रुपए।

The economy shrunk but the government did not spen
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, जुलाई -सितंबर की दूसरी तिमाही में भारत की जीडीपी 7.5 प्रतिशत सिकुड़ गयी है। गौर करें, यह आँकड़े उस काल के हैं जब देश में लॉकडाउन ख़त्म हो चुका था और आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिए सरकार ‘आत्मानिर्भर भारत’ और तमाम दूसरी नई योजनाएँ चला रही थी।

लेकिन ताज़ा जारी आंकड़े बताते है की जुलाई -सितंबर तिमाही में सरकार जो पैसा राज-काज चलाने और कल्याणकारी योजनाओं के लिए खर्च करती है, उसमे असल में कमी आई है। इसका मतलब है की मई महीने में घोषित 20 लाख करोड़ के पैकेज का फ़ायदा लोगो तक नहीं पंहुचा है और सरकार अर्थव्यवस्था में ज्यादा पैसा डालने में नाकाम रही है।


राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक साल 2020 की पहली तिमाही में सरकार ने 7 लाख 26 हज़ार 278 करोड़ रुपए खर्च किये थे, जबकि इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही यानि जुलाई -सितंबर तिमाही में यह आँकड़ा घटकर रह गया 5 लाख 61 हज़ार 812 करोड़ रुपए।

अगर इसकी तुलना पिछले साल की जुलाई -सितंबर तिमाही से करें तो पता चलता है कि सरकार इस साल से ज्यादा पैसा तो पिछले साल खर्च कर रही थी। पिछले साल यही आंकड़ा था 6 लाख 85 हज़ार 212 करोड़ रुपए।

आर्थिक जानकरों की मानें तो सरकार को इस वक्त ज्यादा से ज्यादा पैसा खर्च करना चाहिए ताकि लोगों की क्रय शक्ति बढ़े जो आर्थिक चक्का घुमाने के लिए ज़रूरी है। लेकिन सरकार की समस्या ये है कि उसका  ख़ज़ाना खाली है।

अक्टूबर महीने में ही अनुमानित राजकोषीय घाटा बजटीय अनुमान के 120 फ़ीसदी तक पहुंच गया था। दरअसल, केंद्रीय बजट 2020-21 में अनुमानित राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 7.96 लाख करोड़ रुपये था जो कि 7 महीने में ही  9.53 लाख करोड़ रुपये हो चुका है।

इसी तरह सरकार लगातार जीएसटी कलेक्शन में पिछड़ रही है। अक्टूबर में फरवरी महीने के बाद पहली बार जीएसटी कलेक्शन 1 लाख करोड़ रुपए के पार गया वरना हर महीने जीएसटी कलेक्शन लक्ष्य से कम था। अब सरकार की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि राजकोषीय घाटा और टैक्स वसूली के मोर्चे पर पिछड़ने के बाद वो अपने ख़र्च और योजनाओं के लिए पैसा कहां से लाए?

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