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लॉकडाउन से सिकुड़ा टेलीकॉम सेक्टर, शहरी टेलिडेन्सिटी में भारी गिरावट दर्ज़

by Rahul Gautam 5 months ago Views 2235

Telecom sector shrinks from lockdown, urban telede
देश का टेलीकॉम सेक्टर अब तक के सबसे मुश्किल दौर से गुज़र रहा है. इस सेक्टर में कभी एक दर्जन कंपनियां सक्रिय थीं लेकिन अब मोटे तौर पर सिर्फ तीन कंपनियां रिलायंस जिओ, एयरटेल और वोडाफोन ही बची हैं. बाकि सरकारी कंपनियाँ बीएसएनएल और एमटीएनएल है जो पहले से ही मुश्किलों में है। अब आंकड़ों से समझिये की हाल में ही हुए लॉकडाउन ने कैसे इस सेक्टर की कमर तोड़कर रख दी है।

टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया यानि ट्राई के आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2020 में देश में कुल 117.79 करोड़ सब्सक्राइबर थे जो अगस्त 2020 में घटकर 116. 78 करोड़ सब्सक्राइबर रह गए है ।


इसी तरह ट्राई के अनुसार मार्च 2020 में टेलिडेन्सिटी 87.37 फीसदी थी, वह अगस्त 2020 तक आते आते घटकर 86.23 फीसदी रह गई है। एक भौगोलिक क्षेत्र के भीतर प्रति 100 लोगो पर कितने टेलीफ़ोन कनेक्शन है, उस संख्या को टेलीडेंसिटी कहते है।

शहरों में टेलीडेंसिटी में और गिरावट आई है. आंकड़े बताते हैं कि अर्बन टेलिडेन्सिटी मार्च 2020 में जहां 142.1 फीसदी थी, इस साल अगस्त तक आते आते यह और घटकर 138.17 फीसदी रह गई। ग्रामीण इलाक़ो में हालांकि मामूली बढ़ोतरी दर्ज़ हुई है। मसलन मार्च 2020 में जहां ग्रामीण टेलिडेन्सिटी 58.79 फीसदी थी, वो अगस्त 2020 में 59.06 फीसदी हो गई है।

ट्राई के आंकड़े यह भी बताते है की देश के 8 राज्यों में टेलिडेन्सिटी राष्ट्रीय औसत 86.23 फीसदी से कम है। मसलन बिहार में टेलिडेन्सिटी केवल 52.62, उत्तर प्रदेश में 66.93 और मध्य प्रदेश में 67.07 फीसदी है, जबकि देश की राजधानी दिल्ली में टेलिडेन्सिटी 272.09 फीसदी है।

यह अंतर देश में संसाधनों और पैसे की असमानता को दिखाता है। गौर करे तो मार्च वही महीना है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आखिरी हफ्ते में लॉकडाउन का ऐलान किया था जिसके बाद देश में सभी प्रकार की आर्थिक गतिविधियाँ थम गई थी।

इन आंकड़ों से साफ़ पता चलता है कि जिस देश में कुछ सालों पहले ही टेलीकॉम क्रांति हुई हो, उसी देश में अब टेलीकॉम सेक्टर सिकुड़ रहा है. वोडाफोन और एयरटेल, ये दोनों कंपनियाँ पहले ही कह चुकी है अगर सरकार ने जल्द ही टेलीकॉम सेक्टर को उबारने के लिए कदम नहीं उठाये तो उन्हें बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ेगा. दोनों कंपनियों पर भारी क़र्ज़ और सरकार का पैसा बकाया है।

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