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तीन साल पीछे पहुंचा भारत, जीडीपी 2017 के स्तर पर

by M. Nuruddin 6 months ago Views 1640

No Growth In three years, Countries GDP reached 20
विश्व बैंक के बाद अब रिज़र्व बैंक ने भी माना है कि वित्त वर्ष 2020-21 में देश की अर्थव्यवस्था 9.5 फीसदी तक सिकुड़ने का अनुमान है। इससे पहले विश्व बैंक ने भारत की अर्थव्यवस्था के 9.6 फीसदी तक सिकुड़ने का अनुमान लगाया था। रिपोर्ट में बताया गया है कि कोविड महामारी की वजह से देश विकास के मोर्चे पर और ज़्यादा पिछड़ गया है।

आर्थिक विकास दर में पहले ही करीब 24 फीसदी की गिरावट आ चुकी है जो अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर है। वहीं आरबीआइ की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि भारत की मौजूदा अर्थव्यवस्था तीन साल पीछे चली गई है।


मसलन वित्त वर्ष 2017-18 में देश की जीडीपी का आकार 131.75 लाख करोड़ रूपये था जो अब भी वित्त वर्ष 2020-21 में 131.82 लाख करोड़ रूपये पर है। यानि आसान भाषा में कहें तो इन तीन सालों में देश का विकास लगभग शून्य के स्तर पर पहुंच गया।

जबकि साल 2018 में देश की जीडीपी का आकार 139.81 लाख करोड़ और 2019 में 145.65 लाख करोड़ रूपये आंकी गई थी। आंकड़े देखें तो साफ हो जाता है कि इन अवधियों में देश के आर्थिक विकास दर में लगातार गिरावट देखी गई है।

वित्त वर्ष 2016 में देश का आर्थिक विकास दर 8.26 फीसदी रहा जो अगले साल 2017 में गिरकर 7.04 फीसदी पर आ गया। वहीं साल 2018 यही दर 6.12 फीसदी और 2019 और  घटकर 5.02 फीसदी पर पहुंच गया। जबकि आरबीआइ के गवर्नर शक्तिकांत दास ने बताया है कि वित्त वर्ष 2020-21 में अनुमानित विकास दर 9.5 फीसदी नेगेटिव में जाने का अनुमान है।

इनके अलावा अगर वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में विकास दर की तुलना 2013-14 की पहली तिमाही की विकास दर से करें, तो इस मोर्चे पर भी देश की अर्थव्यवस्था का दिवाला निकल गया है। यानि वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में देश की आर्थिक विकास दर छ: साल पीछे पहुंच गई है।

मसलन वित्त वर्ष 2013-14 की पहली तिमाही में देश की जीडीपी विकास दर 25.6 लाख करोड़ रूपये रही जो अब छह साल बाद वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में 26.9 लाख करोड़ पर आ गई है। वहीं वित्त वर्ष 2013-14 की पहली तिमाही में जीडीपी विकास दर 10.9 फीसदी के मुक़ाबले वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में -23.9 फीसदी पर पहुंच गई है।

आंकड़ों से साफ है कि देश की मोदी सरकार अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर बुरी तरफ फेल साबित हुई है। जानकार मानते हैं कि इसमें सुधार के लिए सरकार को गंभीर रूप से ठोस क़दम उठाने की ज़रूरत है।

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