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'मोदीराज' में बैंक पर बढ़ा भारी दबाव, एनपीए बढ़कर हुआ 46 लाख करोड़

by GoNews Desk 2 months ago Views 1356

Heavy pressure on bank in Modiraj, NPA increased t
मोदी सरकार में देश के सरकारी बैंकों पर दबाव बढ़ा है। रिज़र्व बैंक की नई वार्षिक स्टैटिकल रिपोर्ट ने इस बात की तस्दीक की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इस दौरान देश की बैंकिंग व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। सरकार के पिछले छह साल के कार्यकाल में बैंकों पर एनपीए का दबाव 46 लाख करोड़ रुपये पर पहुँच गया है।

अगर पिछले दस सालों की बात करें तो इनमें चार साल मनमोहन सिंह ने सरकार चलायी और छह साल नरेंद्र मोदी ने। रिपोर्ट से पता चलता है कि मनमोहन के चार साल में एनपीए बढ़ने की दर 175 फीसदी रही जबकि मोदी के शुरुआती चार सालों में ही यह दर 178 फीसदी रही। अगर आँकड़ों में देखें तो मनमोहन सिंह के कार्यकाल में बैंकों पर एनपीए जहाँ दो लाख 64 हज़ार करोड़ रूपये था वो मोदी काल में बढ़कर 9 लाख करोड़ रूपये तक पहुँच गया। एनपीए यानि नॉन पर्फोर्मिंग एसेट, यानि बैंकों द्वारा दिया गया वो क़र्ज़ जो खाते में तो लिखा रहता है, लेकिन जिसकी वापसी की उम्मीद नहीं होती।


आँकड़े यह भी बताते हैं कि पिछले दस सालों में एनपीए का झटका खाने वालों में सरकारी बैंक टॉप पर हैं। मसलन पिछले छह सालों में सरकारी बैंकों का 6 लाख 78 हज़ार करोड़ रूपये से ज़्यादा का क़र्ज़ एनपीए में तब्दील हो गया। जबकि प्राइवेट बैंकों को 20 हज़ार करोड़ और विदेशी बैंकों को दस हज़ार करोड़ से ज़्यादा का नुकसान हुआ। पिछले दस सालों से बैंकों की हालत इसी ट्रेंड के साथ बिगड़ रही है।

नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद जिस दर से बैड लोन की माफी हुई उस दर से रिकवरी दूर की कौड़ी साबित हुई। आसान भाषा में कहें तो 2015-16 में 80 हज़ार 300 करोड़ रूपये की रिकवरी हुई जो उसी साल के एनपीए का एक चौथाई भी नहीं था। इसके बाद वसूली की दर तो बढ़ी लेकिन फिर 2019-20 में घट गई। सीधी बात यह है कि रिकवरी की रक़म कुल एनपीए की तुलना में न के बराबर है।

कहते हैं कि मनमोहन सिंह वो नहीं कर सके जो मोदी जी ने कर दिया। बात भी सही है, 2010 से 2014 तक अपने चार साल के कार्यकाल में मनमोहन सरकार ने 44 हजार 500 करोड़ रुपए का लोन माफ किया। जबकि मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में ही 60 हज़ार करोड़ रूपये का लोन माफ कर दिया था जिसका दबाव सीधे सरकारी बैंकों पर पड़ा। 2017-18 से तो जैसे  क़र्ज़माफी की बहार ही आ गई। 2017 से 2020 तक तीन साल के कार्यकाल में मोदी सरकार ने 6 लाख 35 हजार करोड़ से भी ज्यादा का लोन माफ किया। यही वजह रही कि इस दौरान कई बैंक ध्वस्त हो गए।

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