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दिल्ली वाले आज़ादी के बाद सबसे महँगा पेट्रोल ख़रीदने पर क्यों हुए मजबूर?

by Siddharth Chaturvedi 3 months ago Views 4899

Delhi is forced to buy the most expensive petrol a
आज़ादी के बाद देश की राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की इतनी ऊँची क़ीमत पहली बार हुई है। तेल कंपनियों द्वारा लगातार दूसरे दिन कीमतों में बढ़ोतरी करने के बाद राष्ट्रीय राजधानी में पेट्रोल की कीमत गुरुवार को 84.20 रुपये प्रति लीटर पहुँच गयी, जो 73 सालों में सबसे ज़्यादा है।

वैसे तो पेट्रोल और डीज़ल ऐसी चीजें हैं, जिसके दाम कभी स्थिर नहीं रहते लेकिन अंतरराष्टीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी कमी के बावजूद आम आदमी के लिए क़ीमत में ये बेतरह इज़ाफ़ा लोगों की समझ से बाहर है। आखिर क्या कारण है इसका? और कैसे आप तक पहुंचते-पहुंचते पेट्रोल-डीज़ल की कीमत 3 गुना बढ़ जाती है? आइए समझते हैं...


सबसे पहले तो आप यह जान लें कि भारत अपनी ज़रूरत का 85% से ज्यादा पेट्रोलियम आयात करता है यानी, दूसरे देश से खरीदता है। विदेशों से आने वाला कच्चा तेल प्रति बैरल के हिसाब से ख़रीदा जाता है। एक बैरल में करीब 159 लीटर होते हैं। ये कच्चा तेल रिफ़ाइनरी में जाता है, जहां से पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट अलग किये जाते हैं। इसके बाद ये तेल कंपनियों के पास जाता है। जैसे- इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम। यहां से ये अपना मुनाफ़ा बनाती हैं और पेट्रोल पंप तक पहुँचाती हैं। पेट्रोल पंप पर आने के बाद पेट्रोल पंप का मालिक अपना कमीशन जोड़ता है। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से लगने वाला टैक्स जोड़कर कुल क़ीमत तय की जाती है। इस तरह 25 रुपये प्रति लीटर की दर से सरकार को मिलने वाला पेट्रोल आम आदमी तक पहुँचते-पहुँचते 80 रुपये से ज़्यादा का हो जाता है।

नवंबर 2020 में दिल्ली में 1 लीटर पेट्रोल की कीमत थी 81.06 रुपए। तब इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के हिसाब से 1 लीटर पेट्रोल का बेस प्राइस 25.37 रुपये था। इसके बाद इसमें 32.98 रुपये एक्साइज ड्यूटी, 18.71 रुपये वैट और  3.64 रुपये पेट्रोल पंप के मालिक का कमीशन और दूसरे टैक्स जुड़े और उसकी कीमत पहुंच गई 81 रुपये 6 पैसे।

वहीं पेट्रोल की तरह ही डीज़ल की बेस प्राइस भी 25 रुपये है। नवंबर 2020 को दिल्ली में 1 लीटर डीज़ल का बेस प्राइस 25.42 रुपये था। इस पर 0.33 रुपये का किराया लगाया गया। इसके बाद 31.83 रुपये एक्साइज ड्यूटी, 10.36 रुपये वैट और 2.52 रुपये पेट्रोल पंप के मालिक का कमीशन जुड़ा और कीमत हो गई 70 रुपये 46 पैसे।

पेट्रोल और डीज़ल के दामों से केंद्र और राज्य सरकारों की भी अच्छी ख़ासी कमाई होती है। केंद्र सरकार पेट्रोल-डीज़ल की कीमत पर एक्साइज ड्यूटी लगाती है। मई 2014 में मोदी सरकार आने के बाद से अब तक कई बार एक्साइज ड्यूटी घट-बढ़ चुकी है, जिसमें घटने की संख्या बढ़ने के मुक़ाबले बहुत कम है।यही वजह है कि कच्चे तेल की कीमतें कम होने के बाद भी पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें कम नहीं होतीं।

आँकड़ों के अनुसार 1 अप्रैल 2014 को पेट्रोल पर सरकार 9.48 रुपए की  एक्साइज ड्यूटी लगती थी और डीजल पर 3.56 रुपए की, पर 6 मई   2020 के आते आते पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 32.98 रुपए हो गई और डीज़ल पर 31.83 रुपए।

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी PPAC के मुताबिक, सरकार ने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी और अलग-अलग टैक्स के जरिए कई लाख करोड़ रुपये की कमाई की है। ये कमाई और ज्यादा होती, अगर कोरोना नहीं आया होता और लॉकडाउन न लगा होता। अगर 2014 से सरकार की कमाई गिनी जाए तो वो कुछ इस प्रकार है-

केंद्र सरकार अगर एक्साइज ड्यूटी और अलग-अलग टैक्स लगाकर कमाई करती है तो राज्य सरकारें भी वैट यानी वैल्यू एडेड टैक्स लगाकर कमाती हैं। केंद्र सरकार तो एक ही है, इसलिए पूरे देश में एक ही एक्साइज ड्यूटी लगेगी। लेकिन, राज्य अलग-अलग हैं, तो वैट का रेट भी अलग-अलग होता है।

2014 से राज्य सरकारों की वैट से कमाई गिनी जाये तो वो कुछ इस प्रकार है-

तो यह है कच्चे तेल की कम कीमत के बावजूद आम आदमी के लिए महंगे पेट्रोल-डीज़ल के पीछे का तिलस्म। सिर्फ उम्मीद ही की जा सकती है कि कि दिन सरकार इससे मुनाफ़ा कमाने के बजाय आम आदमी को राहत देने के बारे में सोचेगी।

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