रिज़र्व बैंक के नियमों का उल्लंघन कर स्टेट बैंक ने पिछले पांच साल में बनाए 300 करोड़

by GoNews Desk 5 months ago Views 2049

अहम ये है कि, इस राहत के बावजूद रिज़र्व बैंक को अपने नियमों की समीक्षा और उसका पालन सुनिश्चित करने की ज़रूरत है...

300 million in the last five years by the State Ba
देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया समेत कई अन्य सरकारी और प्राइवेट बैंक ऐसे हैं जो रिज़र्व बैंक के नियमों का उल्लंघन कर मोटी रक़म कमा रहे हैं। आईआईटी बॉम्बे की एक रिपोर्ट से पता चला है कि कई बैंक ज़ीरो बैलेंस या बेसिक सेविंग बैंक डिपोज़िट अकाउंट्स से जुड़ी सेवाओं पर ज़्यादा चार्ज वसूलते हैं जो आरबीआई के नियमों का उल्लंघन है।

रिपोर्ट के मुताबिक़ इस तरह के खातों से चार बार से ज़्यादा ट्रांजेक्शन किए जाने पर बैंक 17 रूपये 70 पैसे वसूलते हैं, जिसे रिज़नेबल नहीं माना जा सकता। रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2015 से 2020 के बीच पांच साल की अवधि में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने करीब 12 करोड़ सेविंग बैंक डिपोज़िट अकाउंट से चार्ज वसूलकर करीब 300 करोड़ रूपये बनाए हैं।


इनमें बैंक ने साल 2018-19 के दौरान 72 करोड़ और 2019-20 के दौरान 158 करोड़ रूपये की ‘वसूली’ की। इतना ही नहीं बैंक ने ऑनलाइन ट्रांजैक्शन सर्विस के लिए भी चार्ज वसूले। कमोबेश अन्य दूसरे बैंकों का भी यही हाल है, जो अपने ग्राहकों से इस तरह चार्ज की वसूली कर मोटे रक़म जुटा रही है। मसलन देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक पीएनबी या पंजाब नेशनल बैंक की बात करें तो इसने पिछले पांच सालों में इस तरह के चार्ज लगाकर करीब चार करोड़ ग्राहकों से करीब दस करोड़ रूपये की वसूली की है।

हालांकि सिर्फ ऐसा नहीं है कि चार्ज एटीएम से ट्रांजैक्शन करने पर ही वसूले जा रहे हैं। बल्कि रिपोर्ट में बताया गया है कि एसबीआई ने मर्चेंट पेमेंट्स के लिए एनईएफटी, आईएमपीएस, यूपीआई, भीम-यूपीआई और डेबिट कार्ड्स के इस्तेमाल पर भी सर्विस चार्ज वसूले हैं। आईआईटी बॉम्बे की रिपोर्ट में कहा गया है कि, ‘एक ओर, देश ने डिजिटल भुगतान के साधनों का ज़ोरदार प्रचार किया, जबकि दूसरी ओर, एसबीआई ने इन बहुत से लोगों को, उनके डिजिटल लेनदेन पर 17.70 रुपये का चार्ज लगाकर, अपने दिन भर के खर्च के लिए डिजिटल लेनदेन के लिए हतोत्साहित किया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि बैकों के इस तरह के रवैये ने ‘फाइनेंशियल इन्क्लूजन की भावना को बौना कर दिया है।’ फाइनेंशियल इन्क्लूजन समाज के पिछड़े और कम आय वाले लोगों को वित्तीय सेवाएँ प्रदान करता है। और ज़रूरी है कि ये सेवाएँ उन लोगों को उनके वहन करने योग्य मूल्य पर मिले।

मसलन इसी साल 1 जनवरी से सरकारी बैंक आईडीबीआई ने सभी ग़ैर नक़द डिजिटल डेबिट यानि यूपीआई, भीम-यूपीआई, आईएमपीएस, एनईएफटी और डेबिट कार्ड से मर्चेंट भुगतान पर 20 रूपये का चार्ज लगाना शुरु दिया है। यहां तक की बैंक एटीएम से कैश विद्ड्रॉल पर 40 रूपये का अतिरिक्त चार्ज भी वसूल रहा है। साथ ही यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि सरकारी आईडीबीआई बैंक एक महीने में 10 डेबिट से परे एक डेबिट चार्ज भी वसूलता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि, ‘इरादे से तो नहीं लेकिन आरबीआई ने बैंकों को सुरक्षा के लिए ड्यूटी बाउंड होने के बावजूद बेसिक सेविंग बैंक डिपोज़िट अकाउंट्स (बीएसबीडीए) ग्राहकों के उत्पीड़न की अनुमति दे दी है।’ यह इस बात से साफ हो जाता है कि बैंकों की इस मनमर्ज़ी को लेकर सबसे पहले आरबीआई में ही शिकायत की गई थी लेकिन ‘बैंकों के बैंक’ ने कोई कार्रवाई नहीं की।

रिपोर्ट के मुताबिक आरबीआई ने अपने ख़ुद के नियमों की निगरानी के लिए ग़ैर-ज़िम्मेदाराना रवैया अपनाया है, जिसने अन्य बैंकों को एक महीने में चार डेबिट से परे चार्ज वसूलने के लिए प्रोत्साहित किया।

इसको लेकर केन्द्र सरकार को भी शिकायत की गई। इसके बाद केन्द्र ने पिछले साल 30 अगस्त को बैंकों को 1 जनवरी 2020 से खाताधारकों से वसूले गए चार्जेज़ वापस करने के निर्देश भी दिए थे। हालांकि कितने ग्राहकों को वसूले गए चार्जेज़ वापस किए गए हैं, इसकी जानकारी फिलहाल नहीं है। अहम ये है कि, इस राहत के बावजूद रिज़र्व बैंक को अपने नियमों की समीक्षा और उसका पालन सुनिश्चित करने की ज़रूरत है।

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