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Year Ender 2020: अर्थव्यवस्था के लिए बुरे सपने की तरह रहा 2020

by Rahul Gautam 4 months ago Views 1289

2020 has been a nightmare for the economy
अगर साल 2019 अर्थव्यवस्था के लिए एक बुरा सपना था तो साल 2020 ने अर्थव्यवस्था को मरणासन्न स्थिति में पहुँचा दिया। पहले से चरमराई इकॉनमी को कोरोना और लॉकडाउन ने ध्वस्त कर रख दिया जिसका नतीजा यह हुआ की पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा भारत की अर्थव्यवस्था को ही नुकसान पंहुचा। साल की शुरुआत में ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने वैश्विक मंदी के लिए संकट में फंसी भारत की अर्थव्यवस्था को ज़िम्मेदार ठहराया। जनवरी महीने में गीता गोपीनाथ के इस दावे ने केंद्र सरकार की हवा निकाल दी थी जो पटरी से उतर गई अर्थव्यवस्था के लिए वैश्विक मंदी को ज़िम्मेदार ठहराती थी।

इसके बाद फरवरी में देश में कोरोना वायरस का प्रकोप बढ़ने लगा जिससे अर्थव्यवस्था को झटके लगने शुरू हुए। पहले से ही मंदी की मार झेल रही अर्थव्यवस्था पर अब कोरोना वायरस का ख़ौफ बट्टा लगाने लगा। विदेशी निवेशक भारत का साथ छोड़ने लगे और भारत की कैपिटल मार्केट से फरवरी 24 से मार्च 11 के बीच 4.96 बिलियन डॉलर यानि 36 हज़ार 221 करोड़ रुपए निकल गये। वायरस को रोकने के लिए इसके बाद मोदी सरकार ने 24 मार्च को राष्ट्रीय लॉकडाउन की घोषणा कर दी लेकिन अनजाने में ही इससे अर्थव्यवस्था को बहुत चोट पहुंची। लॉकडाउन के बाद देश में उद्योग-धंधों की कमर टूट गई है और भविष्य को लेकर संकट गहरा गया।


गिरती अर्थव्यवस्था में जान फूकने के लिए सरकार ने मई में 20 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की। लेकिन इस पैकेज की पोल अंतर्राष्ट्रीय बैंको ने खोलकर रख दी। ज्यादातर अंतर्राष्ट्रीय बैंकों जैसे एचएसबीसी, यूबीएस का कहना था कि मोदी सरकार का 20 लाख करोड़ का पैकेज असल में देश की जीडीपी का केवल एक फीसदी है। वहीं पीएम मोदी ने अपने संबोधन में इसे जीडीपी का 10 फ़ीसदी हिस्सा बताया था।

इसके बाद महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण योजना यानी कि मनरेगा को काँग्रेस सरकार की नाकामयाबी का स्मारक बता चुकी मोदी सरकार इसे आगे बढ़ाने में लग गई। सरकार ने फैसला किया कि वो मनरेगा के लिए तय बजट के अलावा इस मद में 40 हज़ार करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करेगी क्योंकि शहरों से पलायन कर चुके दिहाड़ी मज़दूरों के लिए रोज़ी-रोटी का संकट पैदा हो गया था।

सेंट्रल फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी यानि सीएमआईई की जून माह की रिपोर्ट में कहा गया भारत में इंडेक्स ऑफ़ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (आईआईपी) यानि औद्योगिक उत्पादन सूचकांक -36 पर जा पंहुचा है।  दरअसल, ये सूचकांक देश की औद्योगिक क्षेत्र के उत्पादन के स्थिति के बारे में जानकारी देता है।

ज़ाहिर है इन सबकी इसर सरकार की आमदनी पर पड़ने लगा और सरकार कर उगाही में पिछड़ने लगी। इसके चलते सरकार ने कई राज्यों को जीएसटी का बकाया नहीं दिया जिसकी वजह से उन राज्यों पर भी बोझ बढ़ा। तब एसबीआई की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि चालू वित्त वर्ष में देश की अर्थव्यवस्था को 38 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है। इस नुकसान के चलते देश के हरेक नागरिक की सालाना आय में लगभग 27,000 रुपए की कटौती होने का अनुमान है। इसके बाद लॉकडाउन का असली नतीजा सामने आया। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी किए गये आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जून की पहली तिमाही के लिए भारत की जीडीपी -23.9 प्रतिशत पर गिर गयी। जून तिमाही के जीडीपी के आंकड़े स्वतंत्रता के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में सबसे ख़राब प्रदर्शन रहे। जीडीपी के निराशाजनक आँकड़े सामने आने के बाद तमाम अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने बारी-बारी अपने अनुमानों में संशोधन करना शुरू कर दिया और वे भारतीय अर्थव्यवस्था को डाउनग्रेड करने लगीं। सीएजी ने भी माना की सरकार के आर्थिक पैकेज से अर्थव्यवस्था को कुछ ख़ास गति नहीं मिली।

लॉकडाउन से टेलीकॉम सेक्टर भी सिकुड़ा। मसलन टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया यानि ट्राई के आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2020 में देश में कुल 117.79 करोड़ सब्सक्राइबर थे जो अगस्त 2020 में घटकर 116. 78 करोड़ सब्सक्राइबर रह गये। सितंबर में मालूम पड़ा की देश की अर्थव्यवस्था को हुए नुक्सान के चलते बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का मार्किट कैप देश की जीडीपी से ज्यादा बड़ा हो गया है। इसके बाद नवंबर में जारी हुए NSO के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई-सितंबर की दूसरी तिमाही में भारत की जीडीपी 7.5 प्रतिशत सिकुड़ गयी। गौर करें, यह आँकड़े उस समय के हैं जब देश में लॉकडाउन ख़त्म हो चुका था और आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिए सरकार ‘आत्मानिर्भर भारत’ और तमाम दूसरी नई योजनाएँ चला रही थी। लगातार दो तिमाही में सिकुड़ने से अब भारतीय अर्थव्यवस्था आधिकारिक तौर से मंदी के चक्र में प्रवेश कर चुकी है।

हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग और कृषि सेक्टर के मज़बूत होने से सरकार को उम्मीद है की आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ी से सुधरेगी लेकिन कई जानकारों का मानना है की प्री कोविड स्तर पर इकॉनमी को लाने में अभी काफी समय लगेगा।

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